18 एवं 19 जुलाई, 2026, आनंद
डॉ. एम.एल. जाट, सचिव (डेयर) एवं महानिदेशक (भाकृअनुप) ने 18–19 जुलाई, 2026 के दौरान भाकृअनुप-औषधीय एवं सुगंधित पौध अनुसंधान निदेशालय (भाकृअनुप-डीएमपीआर), आनंद का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने निदेशालय के अनुसंधान कार्यक्रमों की समीक्षा की, वैज्ञानिकों, किसानों और उद्यमियों के साथ संवाद किया तथा औषधीय एवं सुगंधित पौध (एमएपी) क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने के लिए रणनीतिक मार्गदर्शन प्रदान किया।
18 जुलाई को महानिदेशक ने भाकृअनुप-डीएमपीआर के सभी वैज्ञानिकों के साथ विस्तृत संवाद किया। वैज्ञानिकों ने चल रही अनुसंधान परियोजनाओं को प्रस्तुत किया तथा विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत प्राप्त प्रगति को रेखांकित किया। बैठक के दौरान डॉ. जाट ने परियोजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा की और मॉनिटरिंग, इवैल्यूएशन, लर्निंग एंड इम्पैक्ट असेसमेंट (एमईईएलआईए) के महत्व पर चर्चा करते हुए व्यवस्थित मेटाडाटा तैयार करने, प्रलेखन तथा अनुसंधान परिणामों को समय पर अद्यतन करने पर बल दिया। उन्होंने वैज्ञानिकों को भविष्य की संस्थागत आवश्यकताओं के लिए तैयार रहने की सलाह देते हुए उचित डेटा प्रबंधन, प्रभावी निगरानी और परिणाम-आधारित रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने का सुझाव दिया।
19 जुलाई को महानिदेशक ने लांभवेल, आनंद तथा बोरियावी स्थित निदेशालय के अनुसंधान फार्मों का दौरा किया, जहाँ उन्होंने विभिन्न क्षेत्रीय प्रयोगों और अनुसंधान गतिविधियों की समीक्षा की। राष्ट्रीय अभियान "एक पेड़ माँ के नाम" के अंतर्गत उन्होंने संस्थान परिसर में सिंदूर का पौधा रोपा। उन्होंने निदेशालय के नवस्थापित गुग्गल ब्लॉक में अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय एवं व्यावसायिक मूल्य वाला एक गंभीर रूप से संकटग्रस्त औषधीय पौधा गुग्गल का रोपण भी किया।
अपने क्षेत्रीय दौरे के दौरान डॉ. जाट ने प्रौद्योगिकी प्रदर्शन ब्लॉक, हर्बल गार्डन, गिलोय जर्मप्लाज्म ब्लॉक, नर्सरियों और प्रायोगिक खेतों का निरीक्षण किया तथा औषधीय एवं सुगंधित पौधों के संरक्षण, खेती और प्रौद्योगिकी विकास की दिशा में किए गए प्रयासों की सराहना की।
महानिदेशक ने भाकृअनुप-डीएमपीआर द्वारा विकसित उन्नत किस्मों, उत्पादन प्रौद्योगिकियों, मूल्य संवर्धित उत्पादों और बीज नमूनों को प्रदर्शित करने वाली प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया। उन्होंने निदेशालय के मेडी-हब इन्क्यूबेशन सेंटर के अंतर्गत प्रशिक्षित इन्क्यूबेटियों से भी संवाद किया, जिन्होंने संस्थान के तकनीकी सहयोग और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से विकसित नवाचारी उत्पादों और उद्यमशीलता पहलों का प्रदर्शन किया।
डॉ. मनीष दास, निदेशक, भाकृअनुप-डीएमपीआर ने महानिदेशक का स्वागत किया तथा निदेशालय की उपलब्धियों, विकास और भविष्य की अनुसंधान प्राथमिकताओं को प्रस्तुत किया। इस बैठक में क्षेत्रीय भाकृअनुप संस्थानों और केन्द्रों के वैज्ञानिकों ने भी भाग लिया, जिनमें भाकृअनुप-सीआईएएच, सीएटचईएस, गोधरा; आईआईएसडब्ल्यूसी क्षेत्रीय केन्द्र, वसद; भाकृअनुप-सीएसएसआरआई क्षेत्रीय केन्द्र, भरूच; तथा भाकृअनुप-सिफरी अनुसंधान स्टेशन, वडोदरा शामिल थे।
अपने संबोधन के दौरान डॉ. जाट ने भविष्य के अनुसंधान और संस्थागत विकास के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने अनुसंधान कार्यक्रमों के लिए एक सुदृढ़ "थ्योरी ऑफ चेंज" ढाँचा विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया तथा बहुविषयक, टीम-आधारित अनुसंधान के माध्यम से उच्च प्राथमिकता वाली औषधीय एवं सुगंधित फसलों पर अधिक ध्यान केन्द्रित करने का आह्वान किया। उन्होंने "वन टीम–वन टास्क" दृष्टिकोण की स्थिति की समीक्षा की और वैज्ञानिकों से सहयोगात्मक अनुसंधान प्रयासों में तेजी लाने का आग्रह किया।
महानिदेशक ने औषधीय एवं सुगंधित पौधों पर एक व्यापक एटलस तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें जलवायु संबंधी जानकारी, फसल प्रणालियाँ, उत्पादन क्षमता और अन्य महत्वपूर्ण आँकड़ों को शामिल किया जाए, ताकि यह एक मूल्यवान राष्ट्रीय संसाधन के रूप में कार्य कर सके। उन्होंने लंबित बाह्य-वित्तपोषित परियोजना प्रस्तावों की भी समीक्षा की और आश्वासन दिया कि जहाँ भी भाकृअनुप मुख्यालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी, वहाँ सहयोग प्रदान किया जाएगा।
एमएपी खेती को बड़े पैमाने पर अपनाने को बढ़ावा देने के लिए डॉ. जाट ने गुजरात और राजस्थान में दो-दो मॉडल गाँव विकसित करने का प्रस्ताव रखा, जहाँ बड़ी संख्या में किसानों की सक्रिय भागीदारी के साथ औषधीय एवं सुगंधित पौधों की व्यापक खेती की जाएगी, ताकि ऐसे संतृप्ति मॉडल विकसित किए जा सकें जिन्हें अन्य क्षेत्रों में भी दोहराया जा सके।
औषधीय एवं सुगंधित पौधों को भारतीय कृषि के लिए "स्वर्ण खदान" बताते हुए उन्होंने किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण रोजगार सृजन करने और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने की उनकी विशाल क्षमता को रेखांकित किया। उन्होंने विशेष रूप से अनुसूचित जनजाति (एसटी) किसानों के बीच प्राकृतिक खेती आधारित औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती को बढ़ावा देने की वकालत की, ताकि यह आजीविका संवर्धन और पारिस्थितिक संरक्षण का एक सतत मार्ग बन सके।
डॉ. जाट ने सभी वैज्ञानिकों से अनुसंधान कार्यक्रमों की योजना, निगरानी, मूल्यांकन और प्रभावी क्रियान्वयन पर पर्याप्त समय और ध्यान देने का आग्रह किया, ताकि प्रत्येक पहल अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचे और मापनीय प्रभाव उत्पन्न कर सके।
महानिदेशक ने भाकृअनुप-डीएमपीआर से जुड़े किसानों, उद्यमियों और स्टार्ट-अप्स के साथ भी संवाद किया। प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि निदेशालय द्वारा प्रदान किए गए प्रशिक्षण कार्यक्रमों, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और निरंतर सहयोग ने उन्हें सफल उद्यम स्थापित करने तथा औषधीय पौधों की खेती का विस्तार करने में सहायता की है, जिसमें प्राकृतिक खेती अपनाने वाले जनजातीय किसान समुदाय भी शामिल हैं। इन सफलता की कहानियों की सराहना करते हुए डॉ. जाट ने अनुसंधान, प्रौद्योगिकी प्रसार और उद्यमिता विकास के क्षेत्र में निदेशालय के योगदान पर संतोष व्यक्त किया।
भाकृअनुप-डीएमपीआर, आनंद की उल्लेखनीय उपलब्धियों की प्रशंसा करते हुए डॉ. जाट ने कहा कि औषधीय एवं सुगंधित पौध क्षेत्र की अपार संभावनाओं का पूर्ण उपयोग करने के लिए और अधिक प्रयासों की आवश्यकता होगी। उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय से नए संकल्प और नवाचार के साथ कार्य करने का आह्वान किया, ताकि यह क्षेत्र विकसित भारत 2047 के विजन को साकार करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सके।
(स्रोत: भाकृअनुप-औषधीय एवं सुगंधित पौध अनुसंधान निदेशालय, आनंद, गुजरात)







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