12 जून, 2026, बैरकपुर
नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत नदी पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में, संकटग्रस्त हिमालयी गोल्डन महासीर (टॉर पुटिटोरा) के 7,000 उन्नत फिंगरलिंग्स को धारी देवी बांध क्षेत्र के ऊपर अलकनंदा नदी में छोड़ा गया। गोल्डन महासीर, जो जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश की राजकीय मछली है, अत्यंत पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक महत्व वाली एक प्रतिष्ठित प्रवासी प्रजाति है, जिसकी संख्या आवासीय क्षरण, बांध निर्माण, अत्यधिक मत्स्य दोहन और प्रदूषण के कारण घट गई है। भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, (भाकृअनुप-सीआईएफआरआई), बैरकपुर, के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य इस संकटग्रस्त प्रजाति का संरक्षण करना, साथ ही गंगा की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी में जलीय जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन की बहाली करना था।
आज आयोजित इस कार्यक्रम को भाकृअनुप-सीआईएफआरआई ने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (एचएनबीजीयू) के प्राणी विज्ञान विभाग और टिहरी गढ़वाल के मत्स्य विभाग के सहयोग से क्रियान्वित किया, जो अनुसंधान, अकादमिक जगत और क्षेत्रीय स्तर के मत्स्य प्रबंधन के मजबूत समन्वय को दर्शाता है। प्रतिभागियों ने नदी संरक्षण और जलीय जैव विविधता संरक्षण के प्रति जागरूकता तथा सामुदायिक भागीदारी को सुदृढ़ करने की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया।

इस पहल के पारिस्थितिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि उत्तराखंड की राजकीय मछली के रूप में नामित महासीर की आबादी में हिमालयी नदी प्रणालियों में लगातार गिरावट देखी गई है। अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) द्वारा इसे एक संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में मान्यता दी गई है और इसका संरक्षण स्वस्थ नदी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने की प्राथमिकता बन गया है।
इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. डे ने कहा कि नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत अलकनंदा नदी में गोल्डन महासीर फिंगरलिंग्स का छोड़ा जाना जलीय जैव विविधता की बहाली और नदी पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्जीवन में विज्ञान-आधारित हस्तक्षेपों की महत्वपूर्ण भूमिका का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह पहल नदी पुनर्जीवन, जैव विविधता संरक्षण, सतत मत्स्य विकास और ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देने जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है, जिससे पारिस्थितिक लचीलापन और आजीविका के अवसरों दोनों को आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि जलीय संसाधनों का दीर्घकालिक संरक्षण और भारत के अंतर्देशीय मत्स्य क्षेत्र की सतत वृद्धि वैज्ञानिक नवाचार, सक्षम नीतियों, संस्थागत सहयोग और सक्रिय सामुदायिक भागीदारी के प्रभावी समन्वय पर निर्भर करती है।
कार्यक्रम के दौरान छोड़े गए फिंगरलिंग्स का प्रजनन एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास परिसर और टिहरी गढ़वाल के मत्स्य विभाग की सुविधा में स्थापित समर्पित महासीर हैचरियों में किया गया था। इन प्रयासों को नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत भाकृअनुप और भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर के तकनीकी और वित्तीय सहयोग से समर्थन प्राप्त है, जो विज्ञान-आधारित नदी पुनर्स्थापन हस्तक्षेपों को सुदृढ़ करता है।

इस पहल से जुड़े वैज्ञानिकों, जिनमें डॉ. उपेन्द्र सिंह, डॉ. जितेंद्र सिंह राणा और डॉ. रंजीत सिंह शामिल हैं, ने कार्यक्रम के व्यापक संरक्षण प्रभाव को रेखांकित किया। उन्होंने जानकारी दी कि चल रहे मिशन के तहत गंगा बेसिन के विभिन्न हिस्सों में लगभग 40,000 महासीर किशोर मछलियों को पहले ही छोड़ा जा चुका है।
इस कार्यक्रम में शोधार्थियों और स्थानीय हितधारकों, जिनमें सचिन, राहुल, अजय, आयुष और राकेश शामिल थे, के साथ-साथ क्षेत्र के मत्स्य पालकों ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया। इस अवसर पर सभी ने सामूहिक रूप से नदी को स्वच्छ, जीवंत और पारिस्थितिक रूप से लचीला बनाए रखने की साझा प्रतिज्ञा दोहराई, जिससे सामुदायिक सहभागिता आधारित संरक्षण के माध्यम से पुनर्जीवित गंगा के दृष्टिकोण को और मजबूत किया गया।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर, कोलकाता)







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