21 सितंबर, 2026, सोनारपुर, दक्षिण 24 परगना
समावेशी, सतत तथा विज्ञान-आधारित मत्स्य विकास को बढ़ावा देने की एक महत्वपूर्ण पहल के तहत, भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर ने सस्य श्यामला कृषि विज्ञान केन्द्र (आरकेएमवीईआरआई) के सहयोग से पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना के सोनारपुर में अनुसूचित जाति (एससी) के मछली किसानों के लिए एक दिवसीय जागरूकता-सह-इनपुट वितरण कार्यक्रम आयोजित किया।
यह कार्यक्रम डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया, जिन्होंने प्रौद्योगिकी-संचालित और सतत जलीय कृषि पद्धतियों के माध्यम से स्थानीय मत्स्य-आधारित आजीविकाओं को मजबूत करने के महत्व पर जोर दिया।
कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि वैज्ञानिक तालाब प्रबंधन पद्धतियां, जिनमें गुणवत्तापूर्ण बीज का उपयोग, उचित मात्रा में संचयन, संतुलित आहार, उचित जल-गुणवत्ता और मछली स्वास्थ्य प्रबंधन शामिल हैं, मछली उत्पादकता और कृषि आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती हैं। उत्पादकता में सुधार और टाली जा सकने वाली उत्पादन हानियों को कम करने के लिए जल संसाधनों के कुशल उपयोग और समय पर मछली की कटाई पर भी जोर दिया गया।
बेहतर कृषि और मत्स्य प्रौद्योगिकियों के प्रसार में कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके) की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया गया। लाभार्थियों को आपूर्ति किए गए मछली बीज और आहार का विवेकपूर्ण उपयोग करने, उचित उत्पादन रिकॉर्ड बनाए रखने और मछली उत्पादकता तथा आर्थिक लाभ बढ़ाने के लिए निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन के साथ वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

अपने संदेश में, डॉ. डे ने लचीली, उत्पादक और आत्मनिर्भर ग्रामीण मत्स्य प्रणालियों के निर्माण में वैज्ञानिक जलीय कृषि की परिवर्तनकारी क्षमता पर जोर दिया। उन्होंने मछली उत्पादकता बढ़ाने, गुणवत्तापूर्ण मछली बीज और इनपुट तक समय पर पहुंच सुनिश्चित करने तथा विशेष रूप से दूरदराज और वंचित क्षेत्रों में परिवहन एवं लॉजिस्टिक संबंधी चुनौतियों का समाधान करने के लिए स्थान-विशिष्ट, विज्ञान-आधारित जलीय कृषि प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्थानीय मत्स्य मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करने और ग्रामीण आजीविकाओं में विविधता लाने के लिए विकेन्द्रीकृत जलीय कृषि विकास, तकनीकी नवाचार, डिजिटल समाधान और कुशल संसाधन प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने आगे एक समावेशी, जलवायु-लचीले और पर्यावरण की दृष्टि से सतत जलीय कृषि क्षेत्र की परिकल्पना की, जो वैज्ञानिक ज्ञान को स्थानीय संसाधनों और सामुदायिक भागीदारी के साथ एकीकृत करे तथा ग्रामीण समृद्धि, आजीविका सुरक्षा और आत्मनिर्भर मत्स्य अर्थव्यवस्था में योगदान दे।
कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण विशेषता किसानों और मत्स्य विशेषज्ञों के बीच सीधा संवाद था। किसानों ने मछली की वृद्धि, आहार देने की पद्धतियों, तालाब प्रबंधन और मछली स्वास्थ्य से संबंधित जमीनी स्तर के मुद्दे उठाए, जिनका तकनीकी टीम ने व्यावहारिक और स्थान-विशिष्ट सुझावों के माध्यम से समाधान किया।
गुणवत्तापूर्ण आईएमसी फिंगरलिंग, मछली आहार और वैज्ञानिक तकनीकी मार्गदर्शन के संयुक्त प्रावधान से भाग लेने वाले एससी किसानों के बीच मछली उत्पादन और कृषि-स्तरीय लाभ में सुधार के लिए एक मजबूत आधार प्रदान होने की उम्मीद है। इनपुट सहायता से आगे बढ़कर, इस पहल का उद्देश्य किसानों की तकनीकी क्षमता का निर्माण करना और पारंपरिक मछली पालन से उत्पादक, सतत और ज्ञान-आधारित जलीय कृषि की ओर बदलाव को प्रोत्साहित करना है।
भाकृअनुप-सीआईएफआरआई की अनुसूचित जाति उप-योजना (एससीएसपी) के तहत आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य छोटे और सीमांत मछली किसानों को वैज्ञानिक ज्ञान, गुणवत्तापूर्ण जलीय कृषि इनपुट और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करके उनकी क्षमता को मजबूत करना था।

प्रत्येक लाभार्थी को अपने तालाबों में वैज्ञानिक मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए 34 किलोग्राम गुणवत्तापूर्ण मछली आहार और 7 किलोग्राम उन्नत भारतीय प्रमुख कार्प (आईएमसी) फिंगरलिंग प्रदान किए गए।
यह कार्यक्रम समावेशी मत्स्य विकास और प्रौद्योगिकी-आधारित आजीविका संवर्धन के प्रति भाकृअनुप-सीआईएफआरआई और सस्य श्यामला केवीके की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है, विशेष रूप से सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर कृषक समुदायों के बीच।
कार्यक्रम का समापन लाभार्थी किसानों को निरंतर तकनीकी सहायता और अनुवर्ती मार्गदर्शन प्रदान करने की प्रतिबद्धता के साथ हुआ, जिसका व्यापक उद्देश्य मछली पालन को अधिक उत्पादक, सतत और आर्थिक रूप से व्यवहार्य आजीविका उद्यम में बदलना है।
कार्यक्रम में कुल 100 अनुसूचित जाति के मछली किसानों ने भाग लिया।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)







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