भाकृअनुप-एनबीएआईआर, बेंगलुरु ने कीट प्रबंधन के लिए शास्त्रीय जैविक नियंत्रण एजेंटों के आर्थिक प्रभाव आकलन पर राष्ट्रीय कार्यशाला का किया आयोजन

भाकृअनुप-एनबीएआईआर, बेंगलुरु ने कीट प्रबंधन के लिए शास्त्रीय जैविक नियंत्रण एजेंटों के आर्थिक प्रभाव आकलन पर राष्ट्रीय कार्यशाला का किया आयोजन

3 जुलाई, 2026, बेंगलुरु

भाकृअनुप-राष्ट्रीय कृषि कीट संसाधन ब्यूरो (भाकृअनुप-एनबीएआईआर), बेंगलुरु, ने सीएबी इंटरनेशनल (CABI) तथा सोसाइटी फॉर बायोकंट्रोल एडवांसमेंट (SBA) के सहयोग से आज आईसीएआर-एनबीएआईआर, बेंगलुरु में हाइब्रिड मोड में कीट प्रबंधन के लिए शास्त्रीय जैविक नियंत्रण एजेंटों के आर्थिक प्रभाव आकलन पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला में वैज्ञानिकों, कृषि अर्थशास्त्रियों, नीति विशेषज्ञों तथा विभिन्न हितधारकों ने भारत में शास्त्रीय जैविक नियंत्रण (सीबीसी) कार्यक्रमों के आर्थिक लाभों के आकलन की कार्यप्रणालियों पर विचार-विमर्श किया।

डॉ. टी. वेंकटेशन, कार्यवाहक निदेशक, भाकृअनुप-एनबीएआईआर, ने प्रारंभिक संबोधन दिया। उन्होंने आक्रामक कीटों के प्रबंधन तथा रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने के लिए शास्त्रीय जैविक नियंत्रण को पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ और आर्थिक रूप से व्यवहार्य दृष्टिकोण बताते हुए इसके महत्व पर प्रकाश डाला।

ICAR-NBAIR, Bengaluru Hosts National Workshop on Economic Impact Assessment of Classical Biological Control Agents for Pest Management

कार्यशाला की अध्यक्षता डॉ. पूनम जसरोतिया, सहायक महानिदेशक (पादप संरक्षण एवं जैव सुरक्षा), भाकृअनुप, नई दिल्ली, ने की। उन्होंने प्रभावी नीति निर्माण तथा भविष्य के निवेश के लिए जैविक नियंत्रण कार्यक्रमों के दीर्घकालिक आर्थिक, पर्यावरणीय एवं सामाजिक लाभों का दस्तावेजीकरण करने के महत्व पर जोर दिया।

तकनीकी सत्रों में डॉ. टी. वेंकटेशन ने भारत में शास्त्रीय जैविक नियंत्रण के अनुभवों का विस्तृत अवलोकन प्रस्तुत किया, जिसमें आक्रामक कीटों के विरुद्ध सफल हस्तक्षेपों तथा टिकाऊ कृषि में उनके योगदान को प्रदर्शित किया गया। इसके बाद सीएबी इंटरनेशनल की डॉ. मालविका चौधरी ने विभिन्न देशों में शास्त्रीय जैविक नियंत्रण कार्यक्रमों के क्रियान्वयन एवं मूल्यांकन से जुड़े वैश्विक अनुभवों और सर्वोत्तम प्रथाओं पर प्रस्तुति दी।

शास्त्रीय जैविक नियंत्रण कार्यक्रमों के आर्थिक दृष्टिकोण पर आयोजित विशेष सत्र में विशेषज्ञों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने जैविक नियंत्रण हस्तक्षेपों से प्राप्त आर्थिक प्रतिफल के आकलन के विभिन्न तरीकों पर प्रकाश डाला, जिनमें लागत-लाभ विश्लेषण, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का मूल्यांकन, कीटनाशकों के उपयोग में कमी, जैव विविधता में वृद्धि तथा दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक लाभ शामिल हैं। चर्चाओं में भारत में सीबीसी कार्यक्रमों के मूल्यांकन के लिए मानकीकृत कार्यप्रणालियों, आवश्यक आंकड़ों, मॉडलिंग उपकरणों तथा प्रभाव मापदंडों के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया गया।

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कार्यशाला में एक व्यापक विशेषज्ञ संवाद सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने सफल अध्ययन-प्रकरणों, आर्थिक मूल्यांकन की चुनौतियों तथा राष्ट्रीय जैविक नियंत्रण कार्यक्रमों में आर्थिक आकलन को एकीकृत करने के अवसरों पर विचार-विमर्श किया। चर्चाओं में कीट वैज्ञानिकों, कृषि अर्थशास्त्रियों, नीति-निर्माताओं तथा कृषि प्रसार एजेंसियों के बीच अंतःविषयक सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया गया, ताकि साक्ष्य-आधारित जानकारी को सुदृढ़ किया जा सके और जैविक नियंत्रण प्रौद्योगिकियों को व्यापक स्तर पर अपनाने में सहायता मिल सके।

कार्यशाला का समापन सार-सत्र एवं अनुशंसाओं के निर्माण के साथ हुआ। इसमें आर्थिक प्रभाव आकलन के लिए मानकीकृत रूपरेखा विकसित करने, आंकड़ा संग्रह प्रणाली को सुदृढ़ करने, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के मूल्यांकन को शामिल करने तथा टिकाऊ कीट प्रबंधन रणनीतियों के समर्थन हेतु नीति-प्रासंगिक साक्ष्य तैयार करने के महत्व पर विशेष बल दिया गया।

इस कार्यशाला ने शास्त्रीय जैविक नियंत्रण के माध्यम से पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ कीट प्रबंधन को बढ़ावा देने तथा भारतीय कृषि में इसके व्यापक उपयोग के लिए आवश्यक वैज्ञानिक एवं आर्थिक साक्ष्य आधार को मजबूत करने के प्रति आईसीएआर-एनबीएआईआर की प्रतिबद्धता को पुनः स्थापित किया।

(स्रोत: भाकृअनुप-राष्ट्रीय कृषि कीट संसाधन ब्यूरो, बेंगलुरु)

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