भाकृअनुप-आईआईएसडब्ल्यूसी, देहरादून के अधिकारी प्रशिक्षुओं हेतु एकीकृत जलग्रहण, मत्स्य एवं पशुधन प्रबंधन पर प्रशिक्षण सत्र आयोजित

भाकृअनुप-आईआईएसडब्ल्यूसी, देहरादून के अधिकारी प्रशिक्षुओं हेतु एकीकृत जलग्रहण, मत्स्य एवं पशुधन प्रबंधन पर प्रशिक्षण सत्र आयोजित

29 मई, 2026, श्री विजयपुरम, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह

भाकृअनुप–केन्द्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान, श्री विजयपुरम, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के मत्स्य विज्ञान प्रभाग के प्रमुख डॉ. एम. मुरुगानंदम ने आज भाकृअनुप–भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान, देहरादून के 131वें बैच के अधिकारी प्रशिक्षुओं को विशेष व्याख्यानों की एक श्रृंखला प्रदान की।

डॉ. मुरुगानंदम को 22 अप्रैल से 21 अगस्त 2026 तक भाकृअनुप-आईआईएसडब्ल्यूसी, देहरादून द्वारा आयोजित नियमित अधिकारी प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए विशेष अतिथि संकाय सदस्य के रूप में आमंत्रित किया गया था।

Training Sessions on Integrated Watershed, Fisheries and Livestock Management Held for ICAR-IISWC, Dehradun Officer Trainees

अपने व्याख्यानों के दौरान उन्होंने एकीकृत जलग्रहण प्रबंधन के सिद्धांतों तथा इसके विभिन्न घटकों, जिनमें जल निकासी रेखाएँ, विभिन्न श्रेणी की नदियाँ, बंजर एवं अल्प उपयोगित भूमि, जल संचयन संरचनाएँ, कृषि तालाब, जलीय संसाधन, ग्रामीण पशुधन, चारागाह क्षेत्र तथा सामुदायिक घासभूमियाँ शामिल हैं, का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने इन घटकों के बीच परस्पर संबंधों से उत्पन्न होने वाले अवसरों जैसे जल संचयन, नदी प्रबंधन, ऊँचाई वाले क्षेत्रों और निचले क्षेत्रों की अंतःक्रियाएँ, ऊपरी एवं निचले प्रवाह क्षेत्रों के संबंध तथा चारा प्रबंधन पर प्रकाश डाला।

कई समकालीन अवधारणाओं की व्याख्या करते हुए डॉ. मुरुगानंदम ने “माउंटेन टू ओशन (M2O)” स्रोत-से-गंतव्य दृष्टिकोण तथा नदी सततता अवधारणा पर चर्चा की, जो यह स्पष्ट करती है कि विभिन्न मछली प्रजातियाँ नदी पारितंत्र के अलग-अलग हिस्सों में निवास करती हैं और संरक्षण रणनीतियों की योजना बनाते समय इन पहलुओं पर विचार करना क्यों आवश्यक है। उन्होंने अपवाह संकेन्द्रण समय और पर्यावरणीय प्रदूषण क्षमता के बीच संबंध, जल संचयन संरचनाओं (डब्यूएचएस) के डिजाइन में शामिल मान्यताओं, अपवाह उपलब्धता से जुड़ी सीमाओं, भूदृश्य संबंधी बाधाओं तथा जल उपयोग के अवसरों पर भी प्रकाश डाला।

उन्होंने जल संचयन क्षमता और आजीविका अवसरों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया तथा एकीकृत मत्स्य पालन के लिए जल संचयन संरचनाओं के प्रभावी डिजाइन पर चर्चा की। इसके अतिरिक्त उन्होंने मौसमी चारा उपलब्धता और उत्तरदायी चराई तथा चारागाह प्रबंधन के बीच संतुलन के महत्व को समझाया। सत्रों के दौरान उन्नत मत्स्य पालन प्रौद्योगिकियों, जल गुणवत्ता प्रबंधन, उत्पादन निवेशों के अनुकूलन तथा मत्स्य एवं पशुधन आधारित ग्रामीण आजीविका और खाद्य उत्पादन प्रणालियों के लिए संसाधन-कुशल तकनीकों पर भी प्रकाश डाला गया।

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डॉ. मुरुगानंदम ने जोर देकर कहा कि जलग्रहण प्रबंधन, मत्स्य विकास और पशुधन उत्पादन स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के पूरक हैं तथा सूक्ष्म उद्यम विकास के माध्यम से खाद्य सुरक्षा, पोषण संबंधी कल्याण और आजीविका संवर्धन सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि कृषि और खाद्य उत्पादन प्रणालियाँ व्यापक पर्यावरण प्रबंधन ढाँचों का हिस्सा हैं। उर्वरकों की वर्तमान कमी तथा विवेकपूर्ण उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने वाले देशव्यापी जागरूकता अभियानों के संदर्भ में उन्होंने उर्वरकों के संतुलित उपयोग के महत्व को रेखांकित किया।

व्याख्यान सत्रों का समापन एक संवादात्मक प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ, जिसके दौरान अधिकारी प्रशिक्षुओं ने एकीकृत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और सतत खाद्य उत्पादन प्रणालियों पर सक्रिय रूप से चर्चा में भाग लिया।

सत्रों में उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लगभग 20 अधिकारी प्रशिक्षुओं ने भाग लिया।

(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान, श्री विजयपुरम, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह)

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