भाकृअनुप-सिफरी, बैरकपुर ने हिमाचल प्रदेश में स्वदेशी हिमालयी मछलियों के संरक्षण, सतत आजीविका और जैव विविधता संरक्षण को दिया बढ़ावा

भाकृअनुप-सिफरी, बैरकपुर ने हिमाचल प्रदेश में स्वदेशी हिमालयी मछलियों के संरक्षण, सतत आजीविका और जैव विविधता संरक्षण को दिया बढ़ावा

2 अक्टूबर, 2026, लाहौल एवं स्पीति

भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर ने आज हिमाचल प्रदेश के लाहौल एवं स्पीति जिले के उदयपुर में आजीविका में सुधार और जैव विविधता संरक्षण की दिशा में स्वदेशी मछली पालन विषय पर एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। यह कार्यक्रम चंद्रभागा नदी के किनारे स्थानीय समुदायों के बीच स्वदेशी मत्स्य संसाधनों के संरक्षण तथा आजीविका संवर्धन के लिए सतत मत्स्य पालन की संभावनाओं के प्रति जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया।

चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित उदयपुर एक विशिष्ट हिमालयी भू-दृश्य प्रस्तुत करता है, जहां जलीय जैव विविधता, संवेदनशील नदी पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय समुदायों की आजीविका संबंधी आकांक्षाएं आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं। इस कार्यक्रम ने वैज्ञानिक रूप से प्रबंधित मत्स्य पालन और जलीय कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देते हुए स्वदेशी मछली प्रजातियों के संरक्षण के महत्व के प्रति स्थानीय हितधारकों को जागरूक करने के लिए एक मंच प्रदान किया।

इस पहल पर विचार व्यक्त करते हुए डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, ने कहा, “हिमालयी नदियां स्वदेशी जलीय जैव विविधता के अमूल्य भंडार हैं और सतत आजीविका तथा सुदृढ़ ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं की अपार संभावनाएं रखती हैं। देशी मत्स्य संसाधनों का संरक्षण आजीविका संवर्धन, पारिस्थितिक पुनर्बहाली और सामुदायिक भागीदारी के साथ-साथ चलना चाहिए।

विज्ञान-आधारित मछली पालन, आवास संरक्षण, नदी में मत्स्य संचयन तथा ब्लू रिवोल्यूशन के अंतर्गत सरकारी पहलों के साथ समन्वय के माध्यम से आईसीएआर-सीआईएफआरआई अत्याधुनिक मत्स्य प्रौद्योगिकियों और ज्ञान को सुदूरवर्ती समुदायों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसे प्रयास जलवायु-अनुकूल और सतत जलीय आजीविका के निर्माण, नीली अर्थव्यवस्था को मजबूत करने तथा विकसित भारत @2047 के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने में योगदान देंगे, जहां स्वस्थ नदियां, समृद्ध जलीय जैव विविधता और खुशहाल मछुआरा समुदाय समावेशी एवं सतत विकास के मार्ग के अभिन्न अंग बनेंगे।”

कार्यक्रम के दौरान चंद्रभागा नदी में स्वदेशी मछली प्रजातियों के पारिस्थितिक और आजीविका संबंधी महत्व को रेखांकित किया गया। हिमालयी क्षेत्र में जलविद्युत विकास और जलवायु परिवर्तन के बीच इनके संरक्षण एवं सतत प्रबंधन पर विशेष जोर दिया गया। देशी ट्राउट मछलियों के प्रजनन, हैचरी और वैज्ञानिक पालन तकनीकों के महत्व के साथ-साथ मत्स्य संसाधनों में कमी वाले नदी क्षेत्रों में मछलियों के संचयन को भी मछलियों की आबादी की पुनर्बहाली और सतत आजीविका संवर्धन के लिए आशाजनक उपायों के रूप में रेखांकित किया गया।

प्रतिभागियों को भारत सरकार की प्रमुख पहलों, जिनमें प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई), मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि (एफआईडीएफ) तथा प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (पीएम-एमकेएसएसवाई) शामिल हैं, के अंतर्गत उपलब्ध अवसरों की जानकारी भी दी गई।

प्रतिभागियों को महत्वपूर्ण मत्स्य आवासों की पहचान और उनके संरक्षण के महत्व के प्रति जागरूक किया गया। विनाशकारी मत्स्य आखेट पद्धतियों के पारिस्थितिक प्रभावों के बारे में भी बताया गया और नदी आधारित मत्स्य संसाधनों के जिम्मेदार एवं सतत उपयोग की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

इस कार्यक्रम ने हिमालयी क्षेत्र में भाकृअनुप-सीआईएफआरआई की एक महत्वपूर्ण जनसंपर्क पहल के रूप में कार्य किया, जिसमें स्वदेशी मछलियों के संरक्षण, सतत जलीय कृषि और आजीविका संवर्धन से संबंधित वैज्ञानिक ज्ञान को एक साथ लाया गया। यह पहल जैव विविधता संरक्षण के साथ-साथ सतत एवं समावेशी मत्स्य विकास को बढ़ावा देने की आईसीएआर-सीआईएफआरआई की प्रतिबद्धता को और मजबूत करती है।

(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)

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