1–30 जून, 2026, मोतिहारी, बिहार
1–30 जून 2026 के दौरान भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान (एमजीआईएफआरआई), मोतिहारी ने राष्ट्रव्यापी खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत बिहार में मृदा स्वास्थ्य की बहाली, संतुलित उर्वरक उपयोग, समेकित पोषक तत्व प्रबंधन, फसल विविधीकरण तथा जलवायु-सहिष्णु समेकित कृषि प्रणाली (आईएफएस) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक माह का सघन जनजागरूकता अभियान सफलतापूर्वक संचालित किया। यह अभियान भाकृअनुप-एमजीआईएफआरआई के निदेशक डॉ. राघवेंद्र सिंह के समग्र मार्गदर्शन में संचालित किया गया। गतिविधियों का क्रियान्वयन चार बहु-विषयक वैज्ञानिक टीमों द्वारा बिहार सरकार के कृषि विभाग, कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन अभिकरण (एटीएमए), कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), पिपराकोठी, केवीके माधोपुर, केवीके परसौनी, केवीके शिवहर तथा अन्य कृषि विस्तार सहयोगियों के साथ घनिष्ठ समन्वय में किया गया, जिसने अनुसंधान, कृषि विस्तार और राज्य एजेंसियों के बीच सशक्त अभिसरण का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
इस अभियान के अंतर्गत पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, शिवहर और पटना सहित चार जिलों के 19 विकासखंडों तथा 47 गांवों को किसान प्रशिक्षण, किसान गोष्ठियों, किसान चौपालों, मुखिया सम्मेलनों, एक्सपोज़र विज़िट, खेत प्रदर्शन, एफपीओ–वैज्ञानिक संवाद, कृषि आदान विक्रेताओं के साथ संवाद, वैज्ञानिक परामर्श, बाग प्रबंधन कार्यक्रमों तथा समेकित कृषि प्रणाली (आईएफएस) प्रदर्शनों के माध्यम से कवर किया गया। इन कार्यक्रमों में कुल 6,854 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 5,132 पुरुष किसान (74.88%) तथा 1,722 महिला किसान (25.12%) शामिल थीं, जो समावेशी एवं सहभागी कृषि विस्तार के प्रति संस्थान की मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
पूरे अभियान के दौरान वैज्ञानिकों ने मृदा स्वास्थ्य केन्द्रित प्रौद्योगिकियों का एक समग्र पैकेज किसानों के बीच प्रसारित किया, जिसमें मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग, ढैंचा (सेसबानिया) के माध्यम से हरित खाद, ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती, फसल विविधीकरण, जैव उर्वरकों का उपयोग, वर्मी कम्पोस्टिंग, फसल अवशेष पुनर्चक्रण, संरक्षण कृषि, प्रत्यक्ष बीजित धान (डीएसआर), लेज़र भूमि समतलीकरण, धान नर्सरी प्रबंधन, समेकित कीट प्रबंधन तथा जलवायु-सहिष्णु फसल नियोजन शामिल थे। विशेष रूप से उत्तर बिहार के बाढ़-प्रभावित एवं जलभराव वाले पारिस्थितिक तंत्रों के लिए फसल, मत्स्य, पशुपालन, बागवानी तथा संसाधन पुनर्चक्रण को एकीकृत करने वाली समेकित कृषि प्रणाली (आईएफएस) पर विशेष बल दिया गया। किसानों को आम, लीची और पपीता सहित प्रमुख फल फसलों में वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन तथा सतत बाग प्रबंधन पद्धतियों का भी प्रशिक्षण दिया गया।

अभियान की प्रमुख उपलब्धियों में से एक ढैंचा के माध्यम से हरित खाद को बढ़ावा देना रहा, जिसके अंतर्गत किसानों को बताया गया कि अच्छी तरह विकसित ढैंचा की फसल जैविक रूप से प्रति हेक्टेयर 50–60 किलोग्राम नाइट्रोजन स्थिर कर सकती है, जो लगभग 110–130 किलोग्राम यूरिया (2.5–3 बोरी यूरिया) के बराबर है। इससे नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता में उल्लेखनीय कमी आती है, साथ ही मृदा में जैविक कार्बन, सूक्ष्मजीवी गतिविधि, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता तथा दीर्घकालिक मृदा उर्वरता में भी सुधार होता है। वैज्ञानिकों ने किसानों को फसल अवशेष जलाने से बचने, उपजाऊ ऊपरी मिट्टी के संरक्षण, मृदा परीक्षण आधारित संतुलित उर्वरक उपयोग तथा रासायनिक उर्वरकों के साथ जैविक खाद एवं जैव उर्वरकों के समेकित उपयोग के प्रति भी जागरूक किया, ताकि अधिक लचीली और उत्पादक कृषि प्रणालियों का निर्माण किया जा सके।
अभियान पर टिप्पणी करते हुए डॉ. राघवेंद्र सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-एमजीआईएफआरआई, ने कहा, "खेत बचाओ अभियान मृदा स्वास्थ्य संरक्षण और सतत कृषि को बढ़ावा देने के लिए जन-आंदोलन के रूप में उभरकर सामने आया है। भाकृअनुप, कृषि विभाग, एटीएमए, कृषि विज्ञान केन्द्रों तथा किसान समुदायों के सामूहिक प्रयासों के माध्यम से हम वैज्ञानिक नवाचारों को सफलतापूर्वक खेत स्तर पर अपनाने योग्य बना रहे हैं। स्वस्थ मिट्टी ही उत्पादक कृषि, पोषण सुरक्षा, पर्यावरणीय स्थिरता और समृद्ध किसान समुदायों की आधारशिला है।"
अभियान की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए खेत बचाओ अभियान के नोडल अधिकारी ने कहा कि यह अभियान सहयोगात्मक कृषि विस्तार की शक्ति को प्रदर्शित करता है। एक माह में चार जिलों के 6,854 किसानों तक पहुंच बनाना वैज्ञानिकों, कृषि विज्ञान केंद्रों, एटीएमए, पंचायतों, किसान उत्पादक संगठनों तथा प्रगतिशील किसानों के समन्वित प्रयासों की प्रभावशीलता को दर्शाता है। किसान समुदायों की उत्साहपूर्ण भागीदारी बिहार में उत्पादकता, लाभप्रदता और जलवायु लचीलापन बढ़ाने के लिए मृदा स्वास्थ्य केन्द्रित कृषि तथा समेकित कृषि प्रणाली (आईएफएस) के विस्तार की प्रतिबद्धता को और मजबूत करती है।
(स्रोत: भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार)







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