अंडमान कोकम, जिसका वानस्पतिक नाम गार्सिनिया धनिखारिएन्सिस (Garcinia dhanikhariensis) है, एक सूक्ष्म-स्थानिक (माइक्रो-एंडेमिक) प्रजाति है, जो केवल दक्षिण अंडमान द्वीप में ही पाई जाती है। वर्ष 1993 में इस प्रजाति की खोज के समय इन द्वीपों में इस प्रजाति का केवल एक ही पौधा मौजूद होने की सूचना थी। भाकृअनुप-केन्द्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-सीआईएआरआई), श्री विजयपुरम के शोधकर्ताओं ने वर्ष 2015 से इस प्रजाति पर व्यवस्थित अनुसंधान प्रारंभ किया, ताकि इसके संरक्षण की रणनीति विकसित की जा सके तथा खाद्य, औषधि एवं अन्य उद्योगों में इसकी संभावनाओं को समझा जा सके।
इस प्रजाति के संरक्षण के लिए प्रभावी पुनर्जनन (रीजनरेशन) प्रोटोकॉल विकसित करने हेतु कई प्रयोग किए गए। विकसित प्रोटोकॉल का उपयोग करते हुए संस्थान की उद्यानिकी पौध प्रवर्धन इकाई में 2,000 से अधिक पौध तैयार किए गए। इन पौधों ने आवश्यक आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करने में सहायता की, जो ऐसी स्थानिक प्रजातियों के लिए अत्यंत आवश्यक है। इनमें से कुछ पौधों का उपयोग द्वीपों के विभिन्न क्षेत्रों में प्राकृतिक आवास समृद्धिकरण कार्यक्रमों तथा स्थानीय लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए किया गया।
उन्नत संयुक्त क्रोमैटोग्राफिक तकनीकों (हाइफ़नेटेड क्रोमैटोग्राफिक तकनीकों) के माध्यम से किए गए फाइटोकेमिकल प्रोफाइलिंग से यह संकेत मिला कि यह प्रजाति औद्योगिक तथा औषधीय दृष्टि से महत्वपूर्ण यौगिकों जैसे हाइड्रॉक्सीसिट्रिक अम्ल, एंथोसायनिन, वसीय अम्ल (फैटी एसिड) तथा फिनोलिक यौगिकों का एक नया स्रोत है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि यह स्थानिक प्रजाति खाद्य एवं संबद्ध उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराने की पर्याप्त क्षमता रखती है। इन निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए भाकृअनुप-सीआईएआरआई के शोधकर्ताओं ने इस प्रजाति को द्वीपों के लिए एक संभावित फल फसल के रूप में अनुशंसित किया। उन्होंने इस प्रजाति को राष्ट्रीय पहचान देने के उद्देश्य से इसका नाम ‘अंडमान कोकम’ रखा।

यह प्रजाति द्विगृही (डायोशियस) है, अर्थात लगाए गए पौधे नर या मादा हो सकते हैं, जिसकी पुष्टि कई वर्षों बाद फूल आने पर ही संभव होती है। इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए भाकृअनुप-सीआईएआरआई में कलम बांधने (ग्राफ्टिंग) की तकनीक का मानकीकरण किया गया, जिससे किसानों को अपने बगीचों में केवल फल देने वाले पौधे प्राप्त होने की सुनिश्चितता मिल सके। श्रेष्ठ जर्मप्लाज्म की पहचान के लिए भाकृअनुप-सीआईएआरआई द्वारा व्यापक सर्वेक्षण किए गए, जिनके परिणामस्वरूप दक्षिण अंडमान द्वीप में इस प्रजाति के कुछ और पौधों की पहचान हुई, जिनमें नर पौधे भी शामिल थे, जिनकी इस द्विगृही प्रजाति में अब तक सूचना नहीं थी।
इन पौधों से प्राप्त चयनित बीजजनित संततियों (सीडलिंग प्रोजेनी) को भी दीर्घकालिक मूल्यांकन के लिए भाकृअनुप-सीआईएआरआई के प्रायोगिक खेतों में लगाया गया। कई वर्षों तक किए गए मूल्यांकन के बाद एक विशिष्ट जर्मप्लाज्म की पहचान की गई, जिसमें लगातार बड़े आकार के फल तथा अधिक प्रतिशत में फल-छिलका (राइंड), जो इसका प्रमुख आर्थिक भाग है, पाया गया। इन अध्ययनों के निष्कर्ष जर्मनी और संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सहकर्मी-समीक्षित (पीयर-रिव्यूड) शोध पत्रिकाओं जेनेटिक रिसोर्सेज एंड क्रॉप इवोल्यूशन (Genetic Resources and Crop Evolution) तथा इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फ्रूट साइंस (International Journal of Fruit Science) में प्रकाशित किए गए।
पहचाने गए इस जर्मप्लाज्म का ग्राफ्टिंग के माध्यम से गुणन किया गया तथा इसे भाकृअनुप-सीआईएआरआई के राष्ट्रीय सक्रिय जर्मप्लाज्म स्थल (नेशनल एक्टिव जर्मप्लाज्म साइट) पर संरक्षित किया गया। इस जर्मप्लाज्म का पंजीकरण भाकृअनुप-राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर), नई दिल्ली में आईएनजीआर26027 (INGR26027) की विशिष्ट पहचान संख्या के साथ किया गया है। यह जर्मप्लाज्म भविष्य के फसल सुधार कार्यक्रमों तथा क्षेत्र विस्तार गतिविधियों में उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान, श्री विजयपुरम, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह)







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