8 मई, 2026, पटना
पूर्वी क्षेत्र के लिए भाकृअनुप अनुसंधान परिसर, पटना, ने आज “संतुलित एवं पर्यावरण-अनुकूल पोषक तत्व प्रबंधन द्वारा सतत कृषि” विषय पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का सफल आयोजन किया। इस कार्यक्रम में 100 से अधिक हितधारकों, वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों तथा किसानों ने भाग लिया। कार्यशाला का उद्देश्य सतत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन की आवश्यकता पर चर्चा करना तथा चिन्हित जिलों में उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को कम करने के लिए रणनीतियाँ विकसित करना था।
मुख्य अतिथि डॉ संजीव चौरसिया ने कहा कि मृदा स्वास्थ्य की रक्षा करना समाज की जिम्मेदारी है और यह ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य का एक महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने किसानों से मृदा परीक्षण आधारित पोषक प्रबंधन, हरी खाद तथा जैविक आदानों को अपनाने का आह्वान किया ताकि कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।

डॉ. अनूप दास, निदेशक, भाकृअनुप-आरसीएआर ने ‘लॉ ऑफ मिनिमम’ का उल्लेख करते हुए कहा कि फसल उत्पादन उस पोषक तत्व की न्यूनतम उपलब्धता से सीमित होता है जिसकी कमी सबसे अधिक होती है। उन्होंने एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) को अपनाने पर जोर दिया, जिसमें फसल अवशेष पुनर्चक्रण, जैविक खाद एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों का समन्वित उपयोग शामिल है। इससे पर्यावरणीय क्षति कम करते हुए आधुनिक कृषि की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है।
कार्यक्रम में विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किया। इनमें डॉ. विकास दास, निदेशक, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र तथा डॉ राघवेंद्र सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। उन्होंने एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, उर्वरक-संवेदनशील किस्मों तथा अनुशंसित कृषि पद्धतियों को अपनाने पर बल दिया, ताकि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो, उत्पादन लागत घटे और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो सके।
तकनीकी सत्र में पूर्णिया जिले में संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने की रणनीतियों, जैविक एवं एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों तथा पूर्वी भारत में पोषक प्रबंधन के क्षेत्रीय अनुभवों पर चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि पूर्णिया में धान–मक्का फसल प्रणाली की ओर बढ़ता रुझान तथा आलू एवं मखाना की खेती के विस्तार के कारण डीएपी के अत्यधिक उपयोग की समस्या बढ़ी है, जिससे मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

पूर्णिया सहित विभिन्न जिलों से आए किसानों ने कार्यशाला में सक्रिय भागीदारी की। किसानों ने बताया कि जागरूकता की कमी के कारण असंतुलित उर्वरक उपयोग होता है, जिससे खेती की लागत बढ़ती है और मृदा स्वास्थ्य खराब होता है। किसानों ने रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती कीमतों तथा जैव उर्वरकों और गुणवत्तायुक्त जैविक खाद की सीमित उपलब्धता जैसी चुनौतियों का भी उल्लेख किया।
कार्यक्रम में जैव उर्वरकों और जैविक आदानों की प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिससे किसानों को महंगे रासायनिक उर्वरकों के विकल्पों की जानकारी मिली। विशेषज्ञों ने किसानों को ग्रीष्मकाल में ढैंचा की खेती को हरी खाद के रूप में अपनाने के लाभ बताए, जिससे मृदा उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। सहभागी किसानों को ढैंचा के बीज भी वितरित किया गया। साथ ही, यूरिया के पर्णीय छिड़काव का खेत प्रदर्शन भी आयोजित किया गया, ताकि किसानों को व्यावहारिक प्रशिक्षण मिल सके और पोषक तत्वों की हानि कम हो।
इस कार्यशाला में शामिल लगभग 100 प्रतिभागियों, जिनमें किसान, वैज्ञानिक, विशेषज्ञ और अन्य हितधारक ने शिरकत की।
(स्रोत: पूर्वी क्षेत्र के लिए भाकृअनुप अनुसंधान परिसर)







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