ओडिशा के मयूरभंज जिले में फसल विविधीकरण तथा हरित खाद को बढ़ावा देने हेतु भाकृअनुप-क्रिडा ने ग्राम समितियों को किया सक्रिय

ओडिशा के मयूरभंज जिले में फसल विविधीकरण तथा हरित खाद को बढ़ावा देने हेतु भाकृअनुप-क्रिडा ने ग्राम समितियों को किया सक्रिय

12–14 मई, 2026, हैदराबाद

भाकृअनुप-केन्द्रीय शुष्कभूमि कृषि अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-क्रिडा), हैदराबाद, ने ओडिशा कृषि सूखा शमन कार्यक्रम (ओएडीएमपी) के अंतर्गत 12 से 14 मई, 2026 तक ओडिशा के मयूरभंज जिले के रारुआं प्रखंड में एक क्षेत्रीय जन-सक्रियता कार्यक्रम आयोजित किया। इस पहल का उद्देश्य जलवायु-अनुकूल गैर-धान फसलों तथा प्राकृतिक हरित खाद (ग्रीन मैन्योरिंग) पद्धतियों को अपनाने के इच्छुक किसानों की पहचान एवं पंजीकरण के लिए ग्राम समितियों को सक्रिय करना था।

वैज्ञानिकों की टीम ने रारुआं प्रखंड के प्रखंड कृषि अधिकारी (बीएओ) और ब्लॉक टेक्नोलॉजी मैनेजर (बीटीएम) के सहयोग से गोदापालासा, भंजकिया तथा तिलोकुटी ग्राम पंचायतों में व्यापक क्षेत्रीय गतिविधियाँ संचालित कीं। ग्राम समितियों के साथ संवादात्मक बैठकों के माध्यम से लक्षित भूमि क्षेत्रों का मानचित्रण किया गया तथा किसानों का सत्यापित डेटाबेस तैयार किया गया, जिससे परियोजना के अंतर्गत उन्हें सीधे कृषि आदान सहायता प्रदान की जा सके।

ICAR-CRIDA, Hyderabad Mobilises Village Committees for Crop Diversification and Green Manuring under OADMP in Odisha’s Mayurbhanj District

लक्षित गांवों में वर्तमान में खरीफ मौसम के दौरान मुख्यतः निरंतर धान की खेती की जाती है। टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने और जलवायु संबंधी जोखिमों को कम करने के लिए भाकृअनुप-क्रिडा ऊँचाई वाले क्षेत्रों में फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित कर रहा है। इसके लिए ग्राम समितियों के माध्यम से प्रगतिशील किसानों की पहचान की जा रही है, जो अपने समुदाय में मॉडल किसान बनकर अन्य किसानों को प्रेरित कर सकें।

इस पहल के तहत पंजीकृत किसान धीरे-धीरे पारंपरिक धान की खेती से हटकर अरहर, मूंगफली, रागी और मक्का जैसी जलवायु-अनुकूल वैकल्पिक फसलों की खेती अपनाएंगे।

ऊँचाई वाले क्षेत्रों में फसल विविधीकरण के साथ-साथ यह कार्यक्रम निचले धान क्षेत्रों में ढैंचा को हरित खाद फसल के रूप में उगाकर जैविक मृदा पुनर्जीवन पर भी विशेष जोर देता है। वैज्ञानिकों और ग्राम समिति के सदस्यों ने चयनित किसानों को मानसून-पूर्व वर्षा का लाभ उठाते हुए समय पर ढैंचा की बुवाई करने के लिए जागरूक किया।

वैज्ञानिकों ने बताया कि ढैंचा वायुमंडलीय नाइट्रोजन का प्राकृतिक रूप से स्थिरीकरण करता है तथा 6–8 सप्ताह की वृद्धि के बाद इसके अधिकतम वानस्पतिक अवस्था में मिट्टी में मिलाने से मुख्य फसल सीजन से पहले मिट्टी की उर्वरता स्वाभाविक रूप से पुनर्स्थापित होती है। ग्राम समितियों की सक्रिय भागीदारी से बीज वितरण और खेत-स्तरीय क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक पारदर्शी एवं सामुदायिक तंत्र विकसित किया गया है।

ICAR-CRIDA, Hyderabad Mobilises Village Committees for Crop Diversification and Green Manuring under OADMP in Odisha’s Mayurbhanj District

कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिक दल ने कटाई उपरांत अवसंरचना को मजबूत करने तथा स्थानीय आत्मनिर्भरता बढ़ाने के दीर्घकालिक आर्थिक लाभों पर भी प्रकाश डाला। प्रस्तावित हस्तक्षेपों में विकेन्द्रीकृत मिनी मिलों की स्थापना, स्थानीय बीज संकट के समाधान हेतु सामुदायिक बीज बैंक, तथा छोटे किसानों को किफायती दरों पर कृषि मशीनरी उपलब्ध कराने के लिए कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) स्थापित करना शामिल है।

भूमि की उत्पादकता बढ़ाने और किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर सृजित करने के उद्देश्य से किसानों को आम, लीची, अमरूद और अनार जैसी उच्च मूल्य वाली फल फसलों के बाग लगाने के साथ-साथ इमारती लकड़ी के वृक्षों की कतारबद्ध रोपण व्यवस्था विकसित करने में भी सहायता प्रदान की जाएगी। इससे क्षेत्र में दीर्घकालिक एवं टिकाऊ आय के स्रोत विकसित होंगे।

(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय शुष्कभूमि कृषि अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद)

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