9 जून, 2026, श्री विजयपुरम
देशव्यापी "खेत बचाओ अभियान" के अंतर्गत, भाकृअनुप-केन्द्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-क्रिडा), श्री विजयपुरम, ने आज संतुलित उर्वरक उपयोग पर एक सरपंच सम्मेलन एवं परामर्श बैठक का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, कृषि विभाग के अधिकारियों, केन्द्रीय एकीकृत कीट प्रबंधन केन्द्र (सीआईपीएमसी), कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके), दक्षिण अंडमान की आठ पंचायतों के सरपंचों, पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) के सदस्यों तथा प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया और अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में टिकाऊ कृषि पद्धतियों तथा मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन पर चर्चा की।
सभा को संबोधित करते हुए श्री देबब्रत बसंतिया, कृषि निदेशक, अंडमान एवं निकोबार प्रशासन, ने खेत बचाओ अभियान के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला और मृदा स्वास्थ्य संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग मृदा क्षरण, उर्वरता में कमी तथा पर्यावरणीय क्षति का कारण बनता है। उन्होंने किसानों से समय-समय पर मृदा परीक्षण कराने का आग्रह किया तथा ग्राम स्तर पर जैविक एवं प्राकृतिक खेती की पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया।
संवाद के दौरान श्री देबब्रत बसंतिया ने प्रतिभागियों को ट्रैक्टर, पावर टिलर तथा अन्य कृषि उपकरणों की खरीद के लिए उपलब्ध विभिन्न सब्सिडी योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने किसानों को नवीनतम योजनाओं की जानकारी प्राप्त करने तथा विभाग द्वारा प्रदान किए जाने वाले लाभों का उपयोग करने के लिए अपने-अपने क्षेत्रीय कृषि कार्यालयों के नियमित संपर्क में रहने के लिए प्रोत्साहित किया। श्री बसंतिया ने किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीजों और रोपण सामग्री की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विभाग की प्रतिबद्धता को भी दोहराया।
जैविक प्रमाणीकरण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि मान्यता प्राप्त प्रमाणीकरण एजेंसियों के साथ संपर्क स्थापित करने के प्रयास किए जाएंगे तथा किसानों को प्रमाणीकरण प्राप्त करने और अपनी उपज के लिए बेहतर बाजार अवसरों तक पहुंच उपलब्ध कराने हेतु उपयुक्त व्यवस्थाओं की संभावनाओं का पता लगाया जाएगा। उठाए गए मुद्दों के उत्तर में श्री बसंतिया ने किसानों को ट्रैक्टरों और कृषि मशीनरी की खरीद के लिए उपलब्ध विभिन्न सरकारी सब्सिडी योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने उन्हें योजनाओं, कृषि आदानों की उपलब्धता तथा सहायता सेवाओं की अद्यतन जानकारी प्राप्त करने के लिए कृषि विभाग के क्षेत्रीय कार्यालयों के साथ नियमित रूप से संवाद बनाए रखने की सलाह दी।

पपीता मिलीबग के प्रकोप को लेकर किसानों की चिंताओं को संबोधित करते हुए, सीआईपीएमसी के सहायक पादप संरक्षण अधिकारी डॉ. एम. रंजीत ने इस कीट के टिकाऊ नियंत्रण के लिए समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश की। उन्होंने खेत की स्वच्छता बनाए रखने तथा वैकल्पिक आश्रय पौधों को हटाने के महत्व पर बल दिया, ताकि कीटों की संख्या में वृद्धि को कम किया जा सके। उन्होंने आगे प्रति एकड़ 100 संख्या की दर से परजीवी कीट Acerophagus papayae के छोड़ने की सलाह दी, जो पपीता मिलीबग के जैविक नियंत्रण में अत्यधिक प्रभावी सिद्ध हुआ है।
किसानों को पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन विकल्पों के रूप में 25 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से फिश ऑयल रोजिन साबुन, 2 प्रतिशत नीम तेल अथवा 5 प्रतिशत नीम बीज गिरी अर्क (एनएसकेई) के उपयोग की भी सलाह दी गई। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कोक्सिनेलिड भृंगों तथा लाइकेनिड कीटों जैसे लाभकारी प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण पर बल दिया, जो खेत की परिस्थितियों में मिलीबग की आबादी को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
डॉ. जय सुंदर, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएआरआई, ने किसानों से जैविक एवं प्राकृतिक खेती की पद्धतियों को अपनाने का आग्रह किया तथा कृषि विभाग को किसानों के लिए समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु बीजों और रोपण सामग्री की मांग का पूर्व आकलन करने की सलाह दी। उन्होंने प्लास्टिक के उपयोग को कम करने पर भी बल दिया और कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण तथा सूक्ष्म प्लास्टिक मृदा, जल और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं।
उन्होंने किसानों को कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) और आत्मा (ATMA) द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि वे उभरती हुई कृषि प्रौद्योगिकियों से अद्यतन रह सकें। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ब्लॉक स्तर पर बीज उत्पादन को बढ़ावा देने तथा गुणवत्तापूर्ण बीज आपूर्ति में आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करने के लिए स्थानीय उद्यमियों और प्रगतिशील किसानों की पहचान और प्रोत्साहन की वकालत की। उन्होंने टिकाऊ पोषक तत्व प्रबंधन को समर्थन देने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए ब्लॉक स्तर पर वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन इकाइयों की स्थापना की आवश्यकता पर भी बल दिया।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान, श्री विजयपुरम, श्री विजयपुरम, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह)







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