30 जून, 2026, मोतिहारी, बिहार
चल रहे खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत भाकृअनुप–महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप–एमजीआईएफआरआई), मोतिहारी ने किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), शोधकर्ताओं, प्रसार एजेंसियों तथा प्रगतिशील किसानों के बीच सहयोग को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक दिवसीय एफपीओ–वैज्ञानिक–प्रगतिशील किसान संवाद कार्यशाला का आयोजन किया। इसका उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य, जलवायु अनुकूल कृषि तथा बाजारोन्मुखी कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देना था।
कार्यशाला में 14 किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के प्रतिनिधियों, प्रगतिशील किसानों, वैज्ञानिकों तथा प्रसार कार्मिकों ने भाग लिया और सतत कृषि पद्धतियों, संतुलित उर्वरक उपयोग, प्राकृतिक खेती, एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस), मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग, सामूहिक विपणन तथा कृषि-व्यवसाय उद्यमिता जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया। कार्यक्रम में कुल 40 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
उद्घाटन सत्र में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि स्वस्थ मृदा ही उत्पादक, लाभकारी एवं सतत कृषि की आधारशिला है। प्रतिभागियों ने एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम), संतुलित उर्वरक उपयोग, ढैंचा द्वारा हरी खाद, वर्मी कम्पोस्टिंग, फसल विविधीकरण तथा एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस) के महत्व पर प्रकाश डाला, विशेष रूप से बिहार के बाढ़ एवं जलभराव प्रभावित क्षेत्रों के संदर्भ में। सदस्य किसानों के बीच मृदा स्वास्थ्य संबंधी प्रौद्योगिकियों तथा जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने में एफपीओ की भूमिका पर भी जोर दिया गया।
कार्यक्रम में ट्राइकोडर्मा, राइजोबियम, जैव उर्वरक, कम्पोस्ट तथा प्राकृतिक खेती में प्रयुक्त विभिन्न जैविक एवं पर्यावरण-अनुकूल कृषि आदानों को अपनाने के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। किसानों को वनस्पति आधारित अर्क, दशपर्णी अर्क जैसी स्वदेशी कीट प्रबंधन पद्धतियों, फसल अवशेष पुनर्चक्रण, मृदा संरक्षण उपायों तथा मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक अनुशंसाओं के उपयोग के प्रति जागरूक किया गया, ताकि मृदा उर्वरता में सुधार हो तथा कृषि लागत कम की जा सके।
चर्चा के दौरान बिहार के बाढ़ एवं जलभराव प्रभावित क्षेत्रों में कृषि से जुड़ी संभावनाओं और चुनौतियों पर भी विचार किया गया। प्रतिभागियों को सामूहिक उत्पादन, उत्पादों के संग्रहण, मूल्य संवर्धन तथा बाजार से जुड़ाव के लिए दो से तीन गांवों को शामिल करते हुए ग्राम स्तर पर एफपीओ क्लस्टर विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, एसएफएसी, नाबार्ड, आत्मा (एटीएमए) तथा अन्य संस्थागत सहायता कार्यक्रमों के माध्यम से एफपीओ विकास एवं कृषि-व्यवसाय उद्यमिता को समर्थन देने वाली विभिन्न सरकारी पहलों की जानकारी भी साझा की गई।

तकनीकी सत्रों में एफपीओ की प्रौद्योगिकी प्रसार एवं किसान सशक्तिकरण में भूमिका, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) एवं मृदा स्वास्थ्य पुनर्स्थापन, संतुलित उर्वरक उपयोग एवं हरी खाद, मूल्य संवर्धन एवं ब्रांडिंग, पैकेजिंग एवं बाजार संपर्क, जलवायु अनुकूल कृषि, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तथा एफपीओ एवं कृषि उद्यमों के लिए उपलब्ध सरकारी सहायता तंत्र सहित अनेक विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।
प्रतिभागियों ने संस्थान की विभिन्न प्रदर्शन इकाइयों का भी भ्रमण किया, जहाँ मत्स्य आधारित, बकरी आधारित तथा ऊँची एवं नीची क्यारी (रेज़्ड एंड सनकन बेड) आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस) मॉडल, जल प्रबंधन तकनीकों तथा मृदा नमूना संग्रहण का प्रदर्शन किया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि ये समेकित कृषि पद्धतियाँ संसाधनों के उपयोग की दक्षता बढ़ाती हैं, कृषि आय के स्रोतों में विविधता लाती हैं, जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति लचीलापन बढ़ाती हैं तथा किसानों की आजीविका सुरक्षा को मजबूत करती हैं।
संवादात्मक सत्र के दौरान एफपीओ प्रतिनिधियों तथा प्रगतिशील किसानों ने उर्वरकों के उपयोग, कृषि आदानों की उपलब्धता, बाजार तक पहुंच तथा जलवायु संबंधी जोखिमों से जुड़ी खेत स्तर की चुनौतियों को साझा किया। इन समस्याओं के समाधान के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए गए तथा एफपीओ को प्रौद्योगिकी अपनाने की गति तेज करने एवं सतत कृषि परिवर्तन में उत्प्रेरक की भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया गया।
कार्यशाला का समापन मृदा परीक्षण, संतुलित उर्वरीकरण, हरी खाद, फसल विविधीकरण, एकीकृत कृषि प्रणाली, फसल अवशेष पुनर्चक्रण, मूल्य संवर्धन तथा किसान-नेतृत्व वाले नवाचारों को बढ़ावा देने के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ। प्रतिभागियों ने शोधकर्ताओं के साथ प्रत्यक्ष संवाद का अवसर मिलने की सराहना की तथा अपने किसान समूहों एवं एफपीओ नेटवर्क के बीच प्राप्त ज्ञान का प्रसार करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
कार्यक्रम ने सतत कृषि को बढ़ावा देने तथा खेत बचाओ अभियान–2026 के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अनुसंधान संस्थानों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), प्रसार एजेंसियों तथा किसान समुदायों के बीच सहयोग के महत्व को रेखांकित किया।
(स्रोत: भाकृअनुप–महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार)







फेसबुक पर लाइक करें
यूट्यूब पर सदस्यता लें
X पर फॉलो करना X
इंस्टाग्राम पर लाइक करें