14 अगस्त, 2026, गोवा
गोवा के मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत ने गोवा के लोगों, विशेष रूप से मड क्रैब का शिकार करने वालों से अपील की है कि वे अंडे वाली मादा केकड़ों को पकड़ने और उनका सेवन करने से बचें। यह अपील भाकृअनुप–केन्द्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान, गोवा, के वैज्ञानिकों की उपस्थिति में की गई तथा यह जिम्मेदार संसाधन उपयोग तथा सतत स्थानीय उत्पादन की राज्य की स्वयंपूर्ण गोवा दृष्टि के अनुरूप है।
डॉ. सावंत ने जोर देकर कहा कि अंडे वाली मादा मड क्रैब्स की सुरक्षा स्वस्थ केकड़ा आबादी बनाए रखने और मत्स्य पालन की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। उन्होंने मछुआरों, विक्रेताओं और उपभोक्ताओं से अंडे वाली मादा केकड़ों की पहचान करने और उनका शिकार करने के बजाय उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ने का आग्रह किया।

यह संरक्षण पहल भाकृअनुप–सीसीएआरआई में अंडे वाली मादा मड क्रैब्स की सुरक्षा के लिए एक केन्द्रित, समुदाय-उन्मुख दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के वैज्ञानिक प्रयासों से सामने आई है। इस पहल को डॉ. परवीन कुमार, निदेशक, भाकृअनुप–सीसीएआरआई, के नेतृत्व में आगे बढ़ाया गया, जिसका उद्देश्य वैज्ञानिक अवलोकनों को एक व्यावहारिक संरक्षण पद्धति में बदलना था, जिसे मछली पकड़ने वाले और तटीय समुदाय अपना सकें।
एक अंडे वाली मादा मड क्रैब कई लाख से लेकर कई मिलियन तक अंडे दे सकती है। इसलिए, अंडे देने से पहले ऐसी मादा केकड़ों का शिकार भविष्य में केकड़ों की संख्या में वृद्धि और जंगली केकड़ा आबादी की स्थिरता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। इस चिंता को दूर करने के लिए, भाकृअनुप–सीसीएआरआई ने एक सरल तीन-चरणीय संरक्षण दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया है: अंडे वाली मादा केकड़ों की पहचान करना, उनका शिकार करने से बचना और अंडे वाली मादा केकड़ों को वापस छोड़ देना।
इस पहल का उद्देश्य मछली पकड़ने और बिक्री करने वाले समुदायों के बीच अंडे वाली मादा केकड़ों की पहचान के संबंध में जागरूकता बढ़ाना और लैंडिंग केंद्रों तथा बाजारों में उन्हें स्वेच्छा से वापस छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करना है। संरक्षण से संबंधित पहचान और जागरूकता सामग्री भी तटीय तालुकाओं में प्रसारित किए जाने की उम्मीद है, ताकि इस संरक्षण पद्धति को व्यापक रूप से अपनाने में सहायता मिल सके।

इस पहल से गोवा के मुहाना क्षेत्रों और मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्रों में प्राकृतिक रूप से केकड़ों की संख्या में वृद्धि और केकड़ा आबादी के क्रमिक पुनरुद्धार में योगदान मिलने की उम्मीद है। इससे कानूनी आकार वाले, गैर-प्रजनन करने वाले केकड़ों की अधिक स्थिर पकड़ को भी समर्थन मिल सकता है, जंगली प्रजननक्षम केकड़ों पर दबाव कम हो सकता है और राज्य के मड क्रैब मत्स्य पालन की सहनशीलता तथा स्थिरता मजबूत हो सकती है।
यह संरक्षण दृष्टिकोण केकड़ा संसाधनों के समुदाय-आधारित प्रबंधन के लिए एक व्यावहारिक मॉडल के रूप में काम करने की क्षमता रखता है और इसे अन्य तटीय राज्यों में भी दोहराया जा सकता है। इससे पारिस्थितिक संरक्षण के साथ-साथ मछली पकड़ने वाले समुदायों की दीर्घकालिक आजीविका को भी समर्थन मिल सकता है।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान, गोवा)







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