कंद फसलों पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपीटीसी) की देखरेख में, आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी में “बेहतर एलिफेंट फुट याम किस्मों के विकास के लिए मौजूदा स्थिति तथा भविष्य की प्रजनन रणनीति जी” पर एक खास विचार विमर्श बैठक का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में जाने-माने वैज्ञानिक और विशेषरज्ञ इस उच्च मूल्य वाले फसल हेतु एक रणनीतिक कार्य-योजना बनाने के लिए एक साथ आए।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में, डॉ. के. धनंजय राव, कुलपति, डॉ. वाईएसआर बागवानी विश्वविद्य़ालय; डॉ. सुधाकर पांडे, सहायक महानिदेशक (बागवानी विज्ञान), भाकृअनुप; डॉ. आर. रामानंदम, निदेशक, अनुसंधान, डॉ. वाईएसआरएचयू; और डॉ. एम. शेषु माधव, निदेशक, भाकृअनुप–राष्ट्रीय व्यावसायिक कृषि अनुसंधान संस्थान, शामिल हुआ।

इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. जी. बायजू, निदेशक, भाकृअनुप–केन्द्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान, केरल, ने की जिसमें हाथी पांव रतालू के राष्ट्रीय महत्व एवं मिलकर काम करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया।
एलीफैंट फुट याम, ₹3,000–4,000 करोड़ की फसल है जो भारत में उष्णकटिबंधीय कंद उत्पादन में लगभग 10% का योगदान देती है, यह बागवानी क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरा है। हालांकि, राज्यों में उत्पादकता 12 से 60 टन/हैक्टर के बीच है, जबकि लगभग 80 टन/हैक्टर की संभावित क्षमता है, जो उपज के अंतर को कम करने हेतु मिशन-उन्मुख प्रजनन हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता को उजागर करता है।
विचार-विमर्श के दौरान, प्रतिभागियों ने फसल सुधार को प्रभावित करने वाली मुख्य बाधाओं को दूर करने के लिए छोटी, मध्यम एवं लंबी अवधि की प्रजनन रणनीति विकसित करने का संकल्प लिया, जिनमें शामिल हैं:
• शर्मीले तथा एक साथ फूल न आना जिससे हाइब्रिडाइजेशन कम हो जाता है
• छोटा जेनेटिक आधार जिसके लिए डाइवर्सिफिकेशन की ज़रूरत होती है
• कम समय में बनने वाली किस्मों की ज़रूरत
• तीखेपन में कमी तथा खाने की गुणवत्ता में सुधार
• कॉलर रॉट, नेमाटोड और दूसरी बड़ी बीमारियों के लिए प्रतिरोध या रोग प्रतिरोध का विकास
• प्रजनन के मकसद को प्रसंस्करण गुणवत्ता, रखरखाव तथा बाजार की जरूरतों के साथ जोड़ना

बैठक में उत्पादकता, लाभप्रदता एवं टिकाऊपन बढ़ाने के लिए प्रजनन में नवाचार को मजबूत बीज प्रणाली, बीमारी से लड़ने की रणनीति और बाज़ार उन्मुख मूल्य श्रृंखला के साथ जोड़ने की जरूरत पर ज़ोर दिया गया। प्रतिभागियों ने कहा कि लगातार और सहभागी पूर्ण वैज्ञानिक कोशिशों से, हाथी पांव रतालू में उष्णकटिबंधीय बागवानी की एक खास फसल के तौर पर उभरने की क्षमता है, जिससे जेनेटिक मजबुतीकरण ज्यादा फायदे होंगे साथ ही किसानों की आय भी बढ़ेगी।
इस कार्यक्रम में 18 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के लगभग 50 डेलीगेट्स ने हिस्सा लिया, जिससे इस ज़रूरी कंद वाली फसल पर अनुसंधान एवं विकास को आगे बढ़ाने में देश भर से लोगों ने दिलचस्पी दिखाई।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान, केरल)







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