भाकृअनुप–विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा के वैज्ञानिकों की पांच टीमों ने "खेत बचाओ अभियान" के तहत अल्मोड़ा जिले के सल्ट ब्लॉक के नैकाना गांव तथा ताकुला ब्लॉक के बसोली, हड़ोली, कोट्यूरा और पटिया गांवों में जागरूकता शिविर आयोजित किए। यह अभियान डॉ. लक्ष्मी कांत, निदेशक, भाकृअनुप-वीपीकेएएस, के समग्र मार्गदर्शन में संचालित किया गया।
वैज्ञानिकों ने किसानों को मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग और मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन के संबंध में विस्तृत जानकारी प्रदान की। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक और अंधाधुंध उपयोग के दुष्प्रभावों पर चर्चा करते हुए समेकित पोषक तत्व प्रबंधन, हरी खाद, जैव उर्वरकों और उपलब्ध संसाधनों के एकीकृत उपयोग पर विशेष बल दिया गया।

किसानों को जैविक और प्राकृतिक खेती की अवधारणा, इसके लाभों तथा पर्वतीय परिस्थितियों में इसकी संभावनाओं के बारे में जानकारी दी गई। उन्हें खेत की उत्पादकता और दीर्घकालिक मृदा उर्वरता बनाए रखने के लिए जैविक संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की सलाह दी गई। फसल विविधीकरण के अंतर्गत वर्तमान फसल चक्रों में दलहन और तिलहन फसलों को शामिल करने के लाभ, जैसे आय में वृद्धि और मृदा में जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण को बढ़ावा देने पर प्रकाश डाला गया।
कार्यक्रमों के दौरान वैज्ञानिकों ने पर्वतीय फसलों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कीटों और रोगों की पहचान तथा उनके समेकित प्रबंधन पर विस्तृत प्रशिक्षण प्रदान किया। विशेष रूप से क्षेत्र की एक प्रमुख समस्या ‘कुरमुला’ की पहचान, जीवन चक्र और नियंत्रण उपायों के बारे में किसानों को जागरूक किया गया। प्रमुख फसलों, विशेषकर मिर्च में कीट एवं रोग प्रबंधन पर भी वैज्ञानिक सलाह प्रदान की गई।

किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड, पीएम किसान सम्मान निधि, दलहन एवं तिलहन विकास योजनाओं तथा कृषि यंत्रों और आदानों पर उपलब्ध सब्सिडी सहित विभिन्न सरकारी योजनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई। उन्हें ऋण सुविधाओं, बीज और उर्वरक सब्सिडी तथा अन्य कृषि विकास कार्यक्रमों का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
अधिकांश बैठकों में किसानों ने बंदरों और जंगली सूअरों जैसे वन्यजीवों द्वारा फसलों को पहुंचाए जाने वाले नुकसान को अपनी प्रमुख चिंता के रूप में चिन्हित किया। फसल संरक्षण के लिए उपलब्ध वैज्ञानिक और सामुदायिक प्रबंधन विकल्पों पर चर्चा करते हुए वैज्ञानिकों ने किसानों को व्यावहारिक सुझाव प्रदान किए।
इन कार्यक्रमों में 36 पुरुषों और 42 महिलाओं सहित कुल 78 किसानों ने भाग लिया।
(स्रोत: भाकृअनुप–विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा, उत्तराखंड)







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