भाकृअनुप-सीसीएआरआई, केवीके, उत्तरी गोवा ने मिट्टी की टिकाऊ सेहत एवं फसल उत्पादकता हेतु जैविक पोषक तत्व प्रबंधन पर जागरूकता अभियान का किया आयोजन

भाकृअनुप-सीसीएआरआई, केवीके, उत्तरी गोवा ने मिट्टी की टिकाऊ सेहत एवं फसल उत्पादकता हेतु जैविक पोषक तत्व प्रबंधन पर जागरूकता अभियान का किया आयोजन

29 अप्रैल, 2026, गोवा

भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र, उत्तरी गोवा, ने भाकृअनुप-केन्द्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान के तत्वावधान में आज औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान, मापुसा, में कृषि प्रशिक्षुओं के लिए “सतत मृदा स्वास्थ्य एवं फसल उत्पादकता हेतु जैविक पोषक तत्व प्रबंधन” विषय पर जागरूकता अभियान का आयोजन किया।

यह कार्यक्रम “विज्ञान-आधारित पोषक तत्व एवं अन्य इनपुट प्रबंधन को अपनाने हेतु गहन जागरूकता अभियान” के अंतर्गत आयोजित किया गया था। जिसका उद्देश्य सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना तथा ग्रामीण युवाओं एवं कृषि प्रशिक्षुओं के बीच संतुलित एवं पर्यावरण-अनुकूल पोषक तत्व प्रबंधन के महत्व के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना था।

विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि जैविक पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, फसल अवशेष, जैव उर्वरक, तरल जैविक घोल तथा अन्य प्राकृतिक पोषक स्रोतों का उपयोग किया जाता है, जिससे मृदा उर्वरता और पौधों की वृद्धि में सुधार होता है। गोवा की मिट्टियाँ, विशेष रूप से लेटराइट एवं तटीय मिट्टियाँ, पोषक तत्वों की उपलब्धता, नमी संरक्षण तथा मृदा की जैविक सक्रियता बढ़ाने के लिए नियमित रूप से जैविक पदार्थों की आवश्यकता रखती हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि जैविक खादें मृदा स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करने, दीर्घकालिक उत्पादकता बनाए रखने तथा महंगे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में सहायक होती हैं।

ICAR-CCARI, KVK, North Goa Organized Awareness Campaign on Organic Nutrient Management for Sustainable Soil Health and Crop Productivity

इसलिए गोवा की कृषि में धान के खेतों, नारियल बागानों, काजू बागानों, सब्जी उत्पादन, मसाला फसलों तथा उद्यानिकी प्रणालियों के लिए जैविक पोषक तत्व प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। साथ ही यह राज्य के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण में भी सहायक है। गोवा के किसानों को खेतों के अपशिष्टों के पुनर्चक्रण, कम्पोस्ट तैयार करने, जैव उर्वरकों के उपयोग तथा वैज्ञानिक अनुशंसाओं के साथ जैविक आदानों के समन्वित प्रयोग के माध्यम से इन पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया, ताकि मृदा स्वास्थ्य में सुधार और अधिक लाभप्रदता सुनिश्चित की जा सके।

विशेषज्ञों ने जलवायु-सहिष्णु कृषि एवं सतत कृषि प्रणालियों के संदर्भ में जैविक पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों को अपनाने के लाभों पर भी प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में 19 कृषि प्रशिक्षुओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया तथा सतत पोषक तत्व प्रबंधन उपायों और उनके कृषि में व्यावहारिक उपयोग के बारे में सीखने में गहरी रुचि दिखाई।

(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान)

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