भाकृअनुप-सीसीएआरआई, गोवा ने कर्नाटक के कारवार के मत्स्य किसानों के साथ संवाद सत्र का किया आयोजन

भाकृअनुप-सीसीएआरआई, गोवा ने कर्नाटक के कारवार के मत्स्य किसानों के साथ संवाद सत्र का किया आयोजन

एडीबी-वित्तपोषित परियोजना “लघुधारक मत्स्य पालन में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिए क्षमता निर्माण” के अंतर्गत एक्सपोजर सह संवाद सत्र

3 सितंबर 2026, गोवा

भाकृअनुप-केन्द्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान, गोवा द्वारा कार्यान्वित एडीबी-वित्तपोषित परियोजना “लघुधारक मत्स्य पालन में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिए क्षमता निर्माण” के तहत आज कर्नाटक विश्वविद्यालय, कारवार के स्नातकोत्तर केंद्र में एक्सपोजर-सह-संवाद सत्र आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य छोटे पैमाने के मत्स्य किसानों की तकनीकी क्षमता को मजबूत करना तथा जलवायु-अनुकूल एवं सतत जलीय कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना था। सीबास (Lates calcarifer) केज कल्चर किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों पर विशेष जोर दिया गया, जिनमें उच्च जल प्रवाह, बीज की उपलब्धता, रोग प्रबंधन, स्टॉकिंग घनत्व, आहार प्रबंधन, कटाई और विपणन शामिल हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत जलवायु-अनुकूल जलीय कृषि, क्षमता निर्माण और किसान–वैज्ञानिक संवाद को मजबूत करने पर केंद्रित एक उद्घाटन तकनीकी सत्र के साथ हुई। सत्र में सतत मत्स्य प्रबंधन, उन्नत जलीय कृषि पद्धतियों, प्रजातियों और प्रौद्योगिकी विविधीकरण तथा एकीकृत कृषि प्रणालियों को अपनाने के संबंध में महत्वपूर्ण तकनीकी और संस्थागत जानकारी प्रदान की गई।

ICAR-CCARI, Goa Organises Interaction Session with Fish Farmers From Karwar, Karnataka

इंटरैक्टिव चर्चा के दौरान भाग लेने वाले किसानों ने केज कल्चर में उच्च जल प्रवाह, बीज की लागत और उपलब्धता, सीबास विपणन, केकड़ा पालन और सामूहिक खरीद से संबंधित प्रमुख चिंताएं उठाईं। केज में अत्यधिक जल प्रवाह के प्रबंधन के लिए उपयुक्त उपायों पर तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया गया, जिसमें अस्थायी शेड-नेट अवरोधों और उपयुक्त पेन व्यवस्था का उपयोग शामिल है।

चर्चा में केकड़ा पालन, सीबास पॉलीकल्चर, होटलों को सीबास की प्रत्यक्ष बिक्री, आंशिक कटाई और ग्रेडिंग के विभिन्न तरीकों के साथ-साथ मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों (एफएफपीओ) के गठन तथा आहार तथा बीज की सामूहिक खरीद पर भी चर्चा की गई। इन उपायों को उत्पादन दक्षता में सुधार, इनपुट लागत कम करने और बाजार तक पहुंच को मजबूत करने की संभावित रणनीतियों के रूप में रेखांकित किया गया।

तकनीकी सत्र से किसानों में जल-गुणवत्ता प्रबंधन, आहार प्रबंधन, इष्टतम स्टॉकिंग घनत्व, केज रखरखाव, बीज के अनुकूलन, एकीकृत जलीय कृषि, मूल्यवर्धन और बाजार संपर्क के बारे में जागरूकता बढ़ी। सतत जलीय कृषि पद्धतियों को अपनाने और किसान उत्पादक संगठनों के माध्यम से सामूहिक कार्रवाई को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया।

इस संवाद से मत्स्य किसानों, भाकृअनुप-सीसीएआरआई, भाकृअनुप-सीएमएफआऱआई और कर्नाटक विश्वविद्यालय के बीच संबंध मजबूत हुए, जिससे व्यावहारिक समस्या-समाधान, ज्ञान के आदान-प्रदान और वैज्ञानिक एवं तकनीकी मार्गदर्शन तक बेहतर पहुंच सुगम हुई। मत्स्य किसानों तथा अनुसंधान, शैक्षणिक और विकास संस्थानों के प्रतिनिधियों की भागीदारी ने संवाद के सफल आयोजन में योगदान दिया और जमीनी स्तर की जलीय कृषि चुनौतियों के व्यावहारिक समाधान की पहचान के लिए एक मंच प्रदान किया।

(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान, गोवा)

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