7-8 मई, 2026, हुगली
वैज्ञानिक एवं संतुलित उर्वरक उपयोग अभियान के अंतर्गत भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्स्थलीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर तथा कृषि विज्ञान केन्द्र (बीसीकेवी) हुगली द्वारा संयुक्त रूप से हुगली जिले के बलागढ़ ब्लॉक के बकसागढ़ तथा चिनसुरा में मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन एवं सतत मत्स्य पालन पर दो जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य मछली पालकों एवं अन्य हितधारकों को मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन एवं संतुलित उर्वरक उपयोग के महत्व के प्रति जागरूक करना था, ताकि वैज्ञानिक एवं आवश्यकता-आधारित पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों के माध्यम से मत्स्य उत्पादन में वृद्धि, तालाब पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का संरक्षण तथा दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
कार्यक्रमों को वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएफआरआई ने सतत मत्स्य पालन को बढ़ावा देने तथा मृदा एवं जल स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक, क्षेत्र-विशिष्ट एवं आवश्यकता-आधारित संतुलित उर्वरक प्रबंधन पद्धतियों के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन न केवल मत्स्य उत्पादन बढ़ाता है, बल्कि तालाब की पारिस्थितिकी, जल गुणवत्ता और समग्र पर्यावरणीय स्थिरता को भी सुरक्षित रखने में सहायक है। जलवायु परिवर्तनशीलता और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण जैसी उभरती चुनौतियों का उल्लेख करते हुए डॉ. डे ने दीर्घकालिक खाद्य, पोषण एवं आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सुदृढ़ एवं लचीली जलीय कृषि प्रणालियों के विकास हेतु सतत पोषक तत्व प्रबंधन दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

विशेषज्ञों ने मृदा परीक्षण, समेकित पोषक तत्व प्रबंधन तथा रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक एवं अंधाधुंध उपयोग के दुष्परिणामों पर व्यावहारिक जानकारी साझा की।
कार्यक्रम का मुख्य फोकस कृषि एवं मत्स्य पालन उत्पादकता को बनाए रखने में मृदा स्वास्थ्य की महत्वपूर्ण भूमिका पर रहा। विशेषज्ञों ने बताया कि स्वस्थ तालाब की मिट्टी जल गुणवत्ता बनाए रखने, प्राकृतिक उत्पादकता बढ़ाने, मछलियों की स्वस्थ वृद्धि को समर्थन देने तथा जलीय कृषि प्रणालियों में समग्र लाभप्रदता बढ़ाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। प्रतिभागियों को असंगठित एवं अवैज्ञानिक उर्वरक उपयोग की पद्धतियों से दूर रहकर वैज्ञानिक मूल्यांकन एवं स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर संतुलित पोषक तत्व उपयोग अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।
विमर्श के दौरान समय-समय पर मृदा विश्लेषण, जैविक एवं रासायनिक उर्वरकों के उचित चयन एवं उपयोग तथा स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप समेकित पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों के महत्व पर भी बल दिया गया। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी पद्धतियाँ लागत कम करने, पर्यावरणीय क्षरण को न्यूनतम करने तथा कृषि एवं मत्स्य पालन क्षेत्रों में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

इन कार्यक्रमों में 82 किसानों ने सक्रिय भागीदारी की, जिनमें 52 पुरुष एवं 30 महिलाएँ शामिल थीं। प्रतिभागियों ने संतुलित उर्वरक उपयोग तथा फसल एवं मत्स्य प्रणालियों में समेकित पोषक तत्व प्रबंधन से जुड़े विषयों पर वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों के साथ विस्तृत चर्चा की।
संवाद सत्रों ने ज्ञान साझा करने तथा अनुभव आधारित सीखने के लिए एक प्रभावी मंच प्रदान किया, जिससे प्रतिभागियों को सतत पोषक तत्व एवं मृदा प्रबंधन पद्धतियों की गहन समझ प्राप्त हुई। कार्यक्रमों का समापन किसानों की उत्साहपूर्ण भागीदारी एवं अधिक उत्पादक और सतत कृषि एवं मत्स्य भविष्य के लिए पर्यावरण-अनुकूल तथा वैज्ञानिक रूप से निर्देशित उर्वरक प्रबंधन पद्धतियाँ अपनाने के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्स्थलीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)







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