22–24 अप्रैल, 2026, कायमकुलम
भाकृअनुप–केन्द्रीय प्लांटेशन फसल अनुसंधान संस्थान (सीपीसीआरआई) के क्षेत्रीय केन्द्र, कायमकुलम, में 22 से 24 अप्रैल, 2026 तक “बागवानी फसलों में जैव सुरक्षा जोखिम एवं उनके निवारण की रणनीतियाँ” विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। इस संगोष्ठी का उद्देश्य बागवानी फसलों में जैव सुरक्षा से जुड़े जोखिमों पर चर्चा करना तथा ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण के अनुरूप नवीन तकनीकी समाधानों को बढ़ावा देना था।
संगोष्ठी का उद्घाटन डॉ. एस.के. सिंह, उप-महानिदेशक (बागवानी विज्ञान), भाकृअनुप, द्वारा वर्चुअल माध्यम से किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने बागवानी फसलों पर जैव आक्रमण (बायो-इनवेज़न) के बढ़ते खतरों को रेखांकित करते हुए कहा कि इनका आर्थिक प्रभाव अत्यंत गंभीर है और यह राष्ट्रीय आजीविका सुरक्षा के लिए भी जोखिम पैदा करते हैं। उन्होंने इस विषय पर विस्तृत विचार-विमर्श करने तथा जैव सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए ठोस कार्य योजना तैयार करने, जिसमें सतत जैविक समाधानों पर एक श्वेत पत्र विकसित करने पर बल दिया।

अध्यक्षीय संबोधन डॉ. के.बी. हेब्बार, निदेशक, भाकृअनुप–सीपीसीआरआई, कासरगोड, द्वारा दिया गया, जिसमें उन्होंने अजैविक एवं जैविक तनाव कारकों की परस्पर संबद्धता पर जोर दिया। उन्होंने रुगोज़ स्पाइरलिंग व्हाइटफ्लाई, नारियल एरियोफाइड माइट के प्रकोप तथा सुपारी में लीफ स्पॉट रोग जैसे उदाहरणों का उल्लेख किया, जिनसे भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। उन्होंने बताया कि प्रभावी प्रसार के लिए क्षेत्र-आधारित एवं किसान सहभागिता पर आधारित प्रबंधन रणनीतियाँ लागू की जा रही हैं।
मुख्य वक्तव्य डॉ. टी.पी. राजेन्द्रन, पूर्व सहायक महानिदेशक (पादप संरक्षण एवं जैव सुरक्षा) द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि भारत में कड़े संगरोध (क्वारंटीन) कानून होने के बावजूद उनका क्रियान्वयन धीमा है। उन्होंने आक्रामक कीटों के प्रवेश को रोकने के लिए ‘बायोसिक्योरिटी रिस्क एटलस’ के निर्माण तथा मजबूत नीतिगत उपायों की आवश्यकता पर बल दिया।
संगोष्ठी की एक प्रमुख विशेषता डॉ. के.पी.वी. मेनन स्मृति व्याख्यान पुरस्कार 2026 रही, जिसे डॉ. जॉर्ज वी. थॉमस, पूर्व निदेशक, भाकृअनुप–सीपीसीआरआई, द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने डॉ. के.पी.वी. मेनन के शोध योगदानों को रेखांकित करते हुए भविष्य के अनुसंधान की दिशा पर चर्चा की, विशेष रूप से नारियल में जड़ (विल्ट) रोग के प्रबंधन के लिए नवीन समाधानों तथा उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया।
डॉ. आर. सेल्वराजन, निदेशक, भाकृअनुप–राष्ट्रीय केला अनुसंधान केन्द्र, तिरुचिरापल्ली, तथा डॉ. जे. दिनाकरा अडिगा, निदेशक, भाकृअनुप–डीसीआर, पुत्तूर द्वारा सम्मान (फेलिसिटेशन) प्रदान किया गया।
श्री आई. समसुथीन, तेनकासी के एक प्रगतिशील किसान तथा भाकृअनुप–सीपीसीआरआई द्वारा संचालित “लेइंग आउट ऑफ डेमोंस्ट्रेशन प्रोजेक्ट (एलओडीपी)” के लाभार्थी, को उनके नवाचारी एकीकृत कृषि मॉडल के लिए “कल्प वज्र सर्वश्रेष्ठ नारियल किसान पुरस्कार–2026” से सम्मानित किया गया। इस पुरस्कार में ₹10,000 की नकद राशि, प्रशस्ति पत्र, ट्रॉफी और शॉल शामिल थे।
संगोष्ठी के दौरान तीन प्रौद्योगिकी उत्पाद जारी किए गए:
• रेड पाम वीविल के जैविक नियंत्रण के लिए ‘कल्पा स्टाइनरनेमा केरलेंसिस’ कैप्सूल
• नट क्रिंकलिंग कोरिड बग के प्रबंधन के लिए ‘कल्पा अनास्टेटस’ एग कार्ड
• नारियल बागानों में मृदा स्वास्थ्य सुधार के लिए ‘कल्पा वृद्धि’ (PGPR – Pseudomonas migulae) फॉर्मुलेशन
इसके अतिरिक्त, दो तकनीकी पुस्तिकाएँ—“नारियल स्वास्थ्य प्रबंधन” तथा “नारियल के आक्रामक कीट: जैव सुरक्षा जोखिम एवं निवारण रणनीतियाँ”—के साथ ‘नारियल की खेती की पद्धतियाँ’ विषय पर एक तकनीकी फोल्डर भी जारी किया गया।
संगोष्ठी में तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए तथा रोपण सामग्री में जैव सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर एक कार्यशाला भी आयोजित की गई, जिसमें प्रसिद्ध विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किए।
समापन सत्र में डॉ. एन.के. कृष्णकुमार, पूर्व उप-महानिदेशक (बागवानी विज्ञान), भाकृअनुप, ने कृषि जैव सुरक्षा विधेयक, 2013 के पुनर्जीवन तथा अंतर-सीमावर्ती कीटों से निपटने के लिए ‘भारतीय कृषि जैव सुरक्षा प्राधिकरण (एबीएआई)’ की स्थापना की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने रोपण सामग्री के अनियंत्रित आवागमन पर चिंता व्यक्त की तथा बहु-विषयक निगरानी और निदान प्रणालियों में मौजूद कमियों को उजागर किया।

एक पूर्ण अधिवेशन (प्लेनरी) व्याख्यान में नारियल के जड़ (विल्ट) रोग पर हाल के अनुसंधान में हुई प्रगति को रेखांकित किया गया, साथ ही इस क्षेत्र में पूर्व के महत्वपूर्ण योगदानों को भी स्वीकार किया गया।
24 अप्रैल, 2026 को जैव सुरक्षा प्रसार (आउटरीच) पर एक क्रूज़ कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें जागरूकता बढ़ाने और सहयोगात्मक प्रयासों को सुदृढ़ करने पर विशेष ध्यान दिया गया।
एक सत्र में प्लांटेशन फसलों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया गया, जिसमें Hortus Malabaricus जैसे शास्त्रीय ग्रंथ का संदर्भ दिया गया। विशेषज्ञों ने जैव विविधता साक्षरता, आर्थिक प्रभावों तथा प्रभावी प्रसार रणनीतियों जैसे विषयों पर भी विस्तार से चर्चा की।
संगोष्ठी में लगभग 120 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय प्लांटेशन फसल अनुसंधान संस्थान, कासरगोड)







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