2 जून, 2026, उत्तर 24 परगना
भाकृअनुप–कन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई), बैरकपुर, के वैज्ञानिकों ने सीआईएफआरआई–वर्ल्डफिश परियोजना के अंतर्गत पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के चामटा बील में दो उच्च-मूल्य वाली स्वदेशी कैटफिश प्रजातियों — मिस्टस तेंगरा (Mystus tengara) और मिस्टस कवासियस (Mystus cavasius) — के उत्पादन एवं पारिस्थितिक पुनर्स्थापना में एक बड़ी सफलता प्राप्त की है।
इस पहल के अंतर्गत एक अभिनव पुनर्स्थापना रणनीति अपनाई गई, जिसमें इन स्वदेशी कैटफिशों के बीजों को पहले विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए पेन एनक्लोज़र में संरक्षित बंदी परिस्थितियों के तहत पाला गया और उसके बाद चरणबद्ध तरीके से खुले आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में छोड़ा गया। इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मछलियों की जीवित रहने की क्षमता, वृद्धि तथा प्राकृतिक आवास में उनकी स्थापना में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
संवर्धन अवधि के दौरान भाकृअनुप-सीआईएफआरआई के वैज्ञानिकों ने आर्द्रभूमि प्रबंधन के कठोर मानकों को लागू किया, जिनमें अनुकूलित संचयन घनत्व, जल गुणवत्ता की निरंतर निगरानी, परभक्षी प्रबंधन तथा पोषण-संतुलित आहार का प्रबंधन शामिल था। अनुकूलनशील वैज्ञानिक हस्तक्षेपों के माध्यम से संवर्धन प्रणाली में अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियां सुनिश्चित की गईं, जिससे उत्पादन प्रदर्शन में सुधार हुआ और हानि कम हुई।
परिणाम अत्यंत उल्लेखनीय रहे। केवल 4–5 महीनों के भीतर दोनों प्रजातियां बाजार योग्य आकार तक पहुंच गईं, जिससे आर्द्रभूमि पर निर्भर मत्स्य समुदायों के लिए नए आर्थिक अवसर खुल गए। मिस्टस तेंगरा, जो एक उच्च-मूल्य वाली स्वदेशी व्यंजन मछली है, भारतीय प्रमुख कार्प (आईएमसी) की तुलना में लगभग पांच गुना अधिक बाजार मूल्य प्राप्त करती है, जबकि मिस्टस कवासियस का मूल्य लगभग दोगुना होता है, जिससे स्थानीय मछुआरों की आय क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
परियोजना से उत्साहजनक जैविक परिणाम भी प्राप्त हुए। शीतकालीन परिस्थितियों के बावजूद मिस्टस कवासियस ने पांच महीनों के भीतर 19.2 ग्राम का प्रभावशाली औसत शारीरिक भार प्राप्त किया, जो आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में इसके उत्कृष्ट संवर्धन संभावनाओं को दर्शाता है।
इस सफलता पर टिप्पणी करते हुए डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, ने कहा, “आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में स्वदेशी कैटफिशों की सफल पुनर्स्थापना और उत्पादन यह दर्शाता है कि आजीविका सुरक्षा तथा जैव विविधता संरक्षण जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने में विज्ञान-आधारित मत्स्य प्रबंधन की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेप यह रेखांकित करते हैं कि अंतर्देशीय मत्स्य विकास नीतियों में स्वदेशी प्रजातियों के संवर्धन, पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित मत्स्य प्रबंधन तथा सामुदायिक भागीदारी को एकीकृत किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक बीज उत्पादन, अनुकूलनशील संवर्धन प्रोटोकॉल तथा टिकाऊ संचयन रणनीतियों के माध्यम से आईसीएआर-सीआईएफआरआई अंतर्देशीय खुले जल संसाधनों के पुनर्जीवन, मछुआरों की आय सुदृढ़ करने तथा मूल्यवान स्वदेशी जलीय आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण के लिए विस्तार योग्य मॉडल विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है।”
सामुदायिक प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए श्री अपूर्व रॉय, सचिव, चामटा मछुआरा सहकारी समिति ने कहा, “आईसीएआर-सीआईएफआरआई के वैज्ञानिक सहयोग से उच्च-मूल्य वाली स्वदेशी कैटफिशों के पालन द्वारा मछुआरों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हमारी आर्द्रभूमि में मिस्टस तेंगरा जैसी प्रजातियों की वापसी आजीविका तथा जैव विविधता संरक्षण दोनों दृष्टियों से अत्यंत उत्साहजनक है।”
यह सफल हस्तक्षेप दर्शाता है कि विज्ञान-आधारित मत्स्य प्रबंधन किस प्रकार आजीविका संवर्धन, आर्द्रभूमि उत्पादकता में सुधार तथा स्वदेशी जैव विविधता पुनर्स्थापना का प्रभावी समन्वय स्थापित कर सकता है। यह सामुदायिक-आधारित संरक्षण तथा टिकाऊ अंतर्देशीय मत्स्य विकास के लिए एक विस्तार योग्य मॉडल प्रस्तुत करता है।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)







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