भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर द्वारा वर्मी कम्पोस्टिंग के माध्यम से उर्वरक प्रतिस्थापन को बढ़ावा; विकसित भारत 2047 तथा ब्लू इकोनॉमी के विजन के अनुरूप पहल

भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर द्वारा वर्मी कम्पोस्टिंग के माध्यम से उर्वरक प्रतिस्थापन को बढ़ावा; विकसित भारत 2047 तथा ब्लू इकोनॉमी के विजन के अनुरूप पहल

27 अप्रैल, 2026, बैरकपुर

भारत सरकार के संतुलित एवं विवेकपूर्ण उर्वरक उपयोग अभियान के अनुरूप सतत जलीय कृषि (एक्वाकल्चर) को बढ़ावा देने की दिशा में भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सिआईएफआरआई), बैरकपुर, ने वर्मी कम्पोस्टिंग के माध्यम से उर्वरक प्रतिस्थापन की अपनी पहलों को तेज किया है, जिससे पर्यावरण-अनुकूल तथा संसाधन-कुशल पोषक प्रबंधन पद्धतियों को बढ़ावा मिल रहा है।

संस्थान मत्स्य पालन (पिसीकल्चर) में रासायनिक उर्वरकों के प्रभावी विकल्प के रूप में वर्मी कम्पोस्ट और वर्मी वॉश के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है। नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) और पोटाश (K) जैसे आवश्यक प्रमुख पोषक तत्वों के साथ-साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों से समृद्ध वर्मी कम्पोस्ट मृदा एवं जलीय पारिस्थितिक तंत्र के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों में सुधार करता है। इसका उपयोग पोषक तत्वों की उपलब्धता, वायु संचार (एरेशन) और जल धारण क्षमता को बढ़ाता है, जिससे पर्यावरणीय जोखिमों को कम करते हुए सतत उत्पादन सुनिश्चित होता है।

ICAR-CIFRI, Barrackpore Advances Fertiliser Substitution through Vermicomposting; Aligns with Vision of Viksit Bharat 2047 and Blue Economy

परिपत्र जैव-अर्थव्यवस्था (सर्कुलर बायो-इकोनॉमी) के एक मॉडल का प्रदर्शन करते हुए, भाकृअनुप–सीआईएफआरआई ने स्वच्छ भारत पखवाड़ा के दौरान एक वर्मी कम्पोस्टिंग इकाई स्थापित की। यह इकाई परिसर में उपलब्ध जैव अपघटनीय अपशिष्ट जैसे घास, आम और नीम की पत्तियां, यूकेलिप्टस का कचरा तथा केले के अवशेषों को लाल केंचुओं की सहायता से उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद में परिवर्तित करती है, जो “वेस्ट टू वेल्थ” मिशन को साकार करती है।

उर्वरक प्रतिस्थापन रणनीतियों को और मजबूत करते हुए, संस्थान ने मीठे पानी की सूक्ष्म शैवाल जैसे क्लोरेला तथा ग्रेसिएला के लिए वर्मी कम्पोस्ट आधारित किफायती कल्चर मीडिया विकसित किया है, जो मत्स्य हैचरी में महत्वपूर्ण जीवित आहार (लाइव फीड) के रूप में कार्य करता है। यह नवाचार पारंपरिक रासायनिक आधारित मीडिया का एक टिकाऊ एवं किफायती विकल्प प्रदान करता है, जिससे उत्पादन दक्षता बनाए रखते हुए लागत में उल्लेखनीय कमी आती है।

इस पहल पर बोलते हुए, डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुपृ–सीआईएफआरआई, ने कहा, “वर्मी कम्पोस्टिंग के माध्यम से उर्वरक प्रतिस्थापन संतुलित पोषक उपयोग और पारिस्थितिक स्थिरता प्राप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। विकसित भारत 2047 के विजन की ओर बढ़ते हुए, इस प्रकार के प्रकृति-आधारित समाधान ब्लू इकोनॉमी को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। रासायनिक निर्भरता को कम कर और संसाधन दक्षता बढ़ाकर, वर्मी कम्पोस्टिंग अंतर्देशीय मत्स्य पालन को सुदृढ़, आजीविका को टिकाऊ तथा पर्यावरणीय सुरक्षा को दीर्घकालिक बनाती है।”

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उर्वरक उपयोग अनुकूलन अभियान के तहत अपने प्रसार कार्यक्रम के हिस्से के रूप में, भाकृअनुप–सीआईएफआरआई ने बिहार के नवादा जिले के 30 मछुआरों के लिए एक व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। इस प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन एवं उपयोग की तकनीक सिखाई गई, जिससे वे जैविक अपशिष्ट को “ब्लैक गोल्ड” में परिवर्तित कर सतत जलीय कृषि और खेती को अपनाने में सक्षम हो सकें।

यह पहल पर्यावरण-अनुकूल जलीय कृषि पद्धतियों को अपनाने में तेजी लाने, इनपुट दक्षता बढ़ाने और मछुआरों तथा किसानों की आजीविका को सुदृढ़ करने में सहायक होगी, जो भारत के सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान है।

(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)

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