ताज़ी कृषि उपज को अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए कम तापमान और उच्च सापेक्ष आर्द्रता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। पारंपरिक रेफ्रिजरेशन आधारित कोल्ड स्टोरेज प्रणाली ऐसी आवश्यक परिस्थितियाँ उपलब्ध कराती है, लेकिन इसमें प्रारंभिक निवेश बहुत अधिक (₹5-7 लाख प्रति टन) तथा संचालन लागत भी अधिक होती है (प्रति टन 4 किलोवाट-घंटा तक ऊर्जा आवश्यकता)। इसके विकल्प के रूप में, कम लागत और कम ऊर्जा पर आधारित अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष वाष्पीकरण शीतलन तकनीक पर आधारित एक ऑन-फार्म भंडारण प्रणाली विकसित की गई है, जो ताज़ी बागवानी उपज के भंडारण के लिए उपयुक्त है। इस भंडारण इकाई की क्षमता 1 टन है और इसे विशेष रूप से खोखली ईंटों (हॉलो ब्रिक्स) से निर्मित किया गया है।

भंडारण संरचना की अंदरूनी दीवार को विशेष रूप से डिजाइन किए गए PU फोम और पॉलीकार्बोनेट शीट आधारित पैनलिंग से इन्सुलेट किया गया है, ताकि ऊष्मा हानि को कम किया जा सके और अंदर का तापमान नियंत्रित रखा जा सके। इस प्रणाली में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष वाष्पीकरण शीतलन इकाइयों की क्षमता का समुचित डिजाइन कर उन्हें एकीकृत किया गया है। अप्रत्यक्ष वाष्पीकरण शीतलन इकाई में विशेष रूप से डिजाइन किया गया क्रॉस-फ्लो प्रकार प्लेट एवं फिन हीट एक्सचेंजर लगाया गया है।
प्रत्यक्ष वाष्पीकरण शीतलन इकाई में प्रयोगात्मक रूप से मानकीकृत कूलिंग पैड मीडिया का उपयोग किया गया है। इन दोनों प्रणालियों को भंडारण इकाई के साथ इस प्रकार जोड़ा गया है कि आवश्यकता अनुसार इनमें से कोई एक प्रणाली अलग से संचालित हो सकती है, या दोनों को हाइब्रिड मोड में भी चलाया जा सकता है। अंदरूनी भंडारण स्थिति और बाहरी पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार इनके प्रदर्शन मानकों का अनुकूलन किया गया है।

अनुकूलित संचालन स्थितियों में, हाइब्रिड प्रणाली ने सर्वाधिक शीतलन दक्षता और शीतलन क्षमता प्रदर्शित की तथा गर्मियों के चरम 40°C परिवेश तापमान से 18.3°C तक तापमान में कमी प्राप्त की। इस विकसित प्रणाली में ताज़ी खीरे (ककड़ी) की शेल्फ लाइफ सामान्य वातावरण में 3 दिनों की तुलना में बढ़कर 14 दिन तक हो गई, जबकि गुणवत्ता गुणों में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं देखा गया।
यह तकनीक किसानों और हितधारकों को गुणवत्तापूर्ण उत्पाद के विपणन हेतु पर्याप्त समय प्रदान करती है तथा आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने में सहायक है। इस विकसित भंडारण प्रणाली की लागत लगभग ₹3 लाख है और इसकी ऊर्जा खपत केवल 1 किलोवाट-घंटा प्रति टन है।
समग्र रूप से यह तकनीक किसानों और अन्य हितधारकों के लिए एक वरदान सिद्ध होगी।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल)







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