प्लास्टिक आधारित फिल्मों के उपयोग से नन-बायोडिग्रेडेबल प्रकृति के कारण गंभीर पर्यावरण प्रदूषण और पारिस्थितिक क्षति हुई है। ये प्लास्टिक लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं, जिससे मिट्टी, जल एवं जीव-जंतुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस गंभीर समस्या को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया है, ताकि प्रदूषण कम किया जा सके और टिकाऊ विकल्पों को बढ़ावा दिया जा सके।
हालांकि खाद्य पैकेजिंग के लिए बायोडिग्रेडेबल फिल्मों के विकास में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, फिर भी वर्तमान समाधान टिकाऊपन और शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं की शेल्फ लाइफ बढ़ाने—इन दोनों उद्देश्यों को एक साथ पूरा करने में अक्सर सफल नहीं हो पाते।

इसके अतिरिक्त, वर्तमान बायोडिग्रेडेबल फिल्मों में तरल खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग के लिए आवश्यक लचीलापन नहीं है। विशेष रूप से पानी और दूध जैसी तरल वस्तुओं की पैकेजिंग में रिसाव, भरे गए तरल में पॉलिमर के घुलने तथा संरचनात्मक मजबूती जैसी चुनौतियां सामने आती हैं। इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, पानी और दूध की पैकेजिंग के लिए उपयुक्त जैव-अवक्रमणीय फिल्म का विकास किया गया है। यह फिल्म नवीकरणीय संसाधनों जैसे पॉलीसैकराइड, प्रोटीन तथा बायोपॉलीमर का उपयोग कर तैयार की गई है।

विकसित दो प्रकार की बायोफिल्म का परीक्षण IS 15609:2005, IS 11805:2024 तथा ASTM मानकों के अनुसार किया गया। दोनों प्रकार की बायोफिल्म के नमूनों का संबंधित बीआईएस (BIS) मानकों के आधार पर तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया। परिणामों से स्पष्ट हुआ कि पानी और दूध की पैकेजिंग हेतु विकसित ये बायोफिल्म सामग्री संबंधित BIS मानकों के अनुरूप है। साथ ही, इनमें जैव-अवक्रमणीयता का अतिरिक्त लाभ भी है, जो इन्हें पारंपरिक LDPE/LLDPE फिल्मों के पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में अत्यधिक संभावनाशील बनाता है। दोनों फिल्मों का आगे परीक्षण पानी तथा दूध से भरे पाउच बनाकर किया गया। भरे हुए पाउचों पर ड्रॉप टेस्ट तथा लीकेज टेस्ट किए गए, जिनमें संतोषजनक परिणाम प्राप्त हुए।

जहाँ पारंपरिक तीन-स्तरीय एलडीपीई दूध पैकेजिंग फिल्म की उत्पादन लागत लगभग ₹150-160 प्रति किलोग्राम है, वहीं विकसित बायोफिल्म की लागत ₹170-175 प्रति किलोग्राम है। हालांकि, व्यावसायिक स्तर पर बड़े पैमाने पर उत्पादन होने पर इसकी लागत और कम की जा सकती है। यह नवाचार पर्यावरण संरक्षण, प्लास्टिक प्रदूषण में कमी तथा टिकाऊ पैकेजिंग समाधानों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल)







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