24 मार्च, 2026, हिसार
भाकृअनुप–केन्द्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान (सीआआरबी), हिसार, ने अपने संस्थान प्रौद्योगिकी प्रबंधन इकाई (आटीएमयू) के तत्वावधान में आज “भैंस प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, व्यवसायीकरण और सहयोग” विषय पर एक संस्थान–उद्योग बैठक का आयोजन किया।
इस बैठक में अग्रणी उद्योगों की उत्साहपूर्ण भागीदारी रही, जिसमें हेस्टर बायोसाइंसेज लिमिटेड; तारा इंटरनेशनल, वडोदरा; जेडीएन टेक्नोलॉजी; कारगिल एनिमल न्यूट्रिशन एंड हेल्थ; जगमोहन इंडस्ट्रीज, लुधियाना; फार्मविक लाइवस्टॉक टेक्नोलॉजी प्रा. लि.; इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड; हरियाणा वैक्सीन इंस्टीट्यूट; टाइटैनिक फार्मास्यूटिकल्स प्रा. लि.; हिसार बोवाइन स्पर्म स्टेशन एंड रिसर्च सेंटर; पराशर इंडस्ट्रीज; नेक्स्टजेन लाइफ साइंसेज; और केमिन इंडस्ट्रीज सहित पशुपालन क्षेत्र के कई उभरते उद्यम शामिल थे।
इस बैठक में देश के प्रमुख संस्थानों के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने भाग लिया, जिनमें सेवारत और सेवानिवृत्त विशेषज्ञ शामिल थे, जो पशु आनुवंशिकी, पोषण, शरीर क्रिया विज्ञान, सूक्ष्मजीव विज्ञान, औषधि विज्ञान, चिकित्सा और पशुधन उत्पादन जैसे विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
प्रो. (डॉ.) विनोद कुमार वर्मा, कुलपति, लुवास, हिसार, ने मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। उन्होंने कहा कि किसान अनुसंधान और नवाचार के अंतिम हितधारक हैं। उन्होंने उद्योग की भूमिका को अनुसंधान संस्थानों और किसानों के बीच एक सेतु के रूप में रेखांकित किया, जो तकनीकों के प्रभावी प्रसार, व्यावसायीकरण और अपनाने में सहायक होता है। उन्होंने यह भी कहा कि अनुसंधान को व्यावहारिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के लिए अकादमिक संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने किसानों के लिए क्षमता निर्माण, कौशल विकास और जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया, ताकि तकनीकों को सफलतापूर्वक अपनाया जा सके। उन्होंने किसानों और उद्योग की भागीदारी के साथ अनुसंधान योजना बनाने की वकालत की, जिससे शोध परिणामों की प्रासंगिकता और प्रभाव बढ़ सके।
कार्यक्रम के प्रारंभ में, डॉ. टी.के. भट्टाचार्य, निदेशक, भाकृअनुप-सीआआरबी, ने भैंस अनुसंधान, विस्तार और प्रौद्योगिकी प्रसार में संस्थान के महत्वपूर्ण योगदानों को रेखांकित किया। उन्होंने भैंसों को देश का “काला सोना” बताते हुए ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ करने और किसानों की आय बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रयोगशाला अनुसंधान और क्षेत्रीय स्तर पर उसके अनुप्रयोग के बीच की खाई को पाटने की आवश्यकता पर बल दिया और “टॉप-डाउन” के बजाय “बॉटम-अप” दृष्टिकोण अपनाने की बात कही, जिसमें अनुसंधान की प्राथमिकताएं किसानों और उद्योग की जरूरतों के अनुसार निर्धारित हों। उन्होंने यह भी कहा कि अनुसंधान मांग-आधारित, परिणामोन्मुखी होना चाहिए और उसे समयबद्ध तरीके से व्यावहारिक तकनीकों में परिवर्तित किया जाना चाहिए। उन्होंने उद्योग सहयोग के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि नवाचारों के विस्तार और वास्तविक प्रभाव के लिए साझेदारी आवश्यक है।
पैनल चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने सेक्स-सॉर्टेड सीमेन और एम्ब्रियो ट्रांसफर जैसी उन्नत प्रजनन तकनीकों की भूमिका पर प्रकाश डाला, जो भैंसों में आनुवंशिक सुधार और प्रजनन दक्षता बढ़ाने में सहायक हैं। उन्होंने एफएमडी, एचएस और सुर्रा जैसी बीमारियों से निपटने के लिए स्वदेशी डायग्नोस्टिक किट और डेटा-आधारित वैक्सीन विकास की आवश्यकता पर भी जोर दिया, साथ ही एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा की।
बैठक में मौसम-विशिष्ट आहार रणनीतियों के महत्व पर भी चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि सतत पशुधन उत्पादकता और लाभप्रदता को बढ़ाने के लिए अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच मजबूत सहयोग आवश्यक है। यह बैठक संवाद को बढ़ावा देने, अनुसंधान में अंतराल की पहचान करने और अकादमिक एवं उद्योग के बीच साझेदारी को सुदृढ़ करने का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुई, जिससे तकनीक हस्तांतरण को प्रभावी बनाया जा सके और किसानों के लिए बेहतर परिणाम सुनिश्चित किए जा सकें।
इस संस्थान–उद्योग बैठक में वैज्ञानिकों, उद्योग प्रतिनिधियों, प्रगतिशील किसानों, शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों सहित कुल 160 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान, हिसार)







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