24 अप्रैल, 2026, मालदा
पंचायती राज दिवस के अवसर पर भाकृअनुप–केवीके (सीआईएसएच), मालदा में ‘कार्बन-न्यूट्रल पंचायतों की ओर: जमीनी स्तर पर जलवायु कार्रवाई के लिए संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) के सदस्यों तथा किसानों ने भाग लिया तथा स्थानीय शासन को जलवायु-सहिष्णु कृषि पद्धतियों के साथ एकीकृत करने पर विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम में पंचायतों की भूमिका को जमीनी स्तर पर जलवायु कार्रवाई के प्रमुख प्रेरक के रूप में रेखांकित किया गया, जो वैज्ञानिक संस्थानों एवं किसान समुदाय के बीच एक प्रभावी सेतु का कार्य करती हैं।
मुख्य वक्तव्य में, डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप–कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, कोलकाता, ने वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि कार्बन-न्यूट्रल पंचायतों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन के साथ संतुलित एवं विवेकपूर्ण उर्वरक उपयोग को अपनाना आवश्यक है। उन्होंने मृदा स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करने, उत्पादकता बढ़ाने और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए जैविक एवं अकार्बनिक पोषक स्रोतों के साथ-साथ जैव उर्वरकों के समेकित उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने पंचायतों, केवीके और अनुसंधान संस्थानों के बीच मजबूत संस्थागत समन्वय की आवश्यकता पर भी बल दिया, ताकि किसानों को सशक्त बनाया जा सके और सतत ग्रामीण विकास सुनिश्चित किया जा सके।

तकनीकी सत्रों में स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप जलवायु-स्मार्ट फसल प्रणालियों पर चर्चा की गई, जिसमें रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करने के लिए पर्यावरण-अनुकूल और कम लागत वाले विकल्पों पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने मृदा उर्वरता और फसल सहनशीलता बढ़ाने के लिए पोटाश एवं फॉस्फोरस घुलनशील जीवाणु जैसे जैव उर्वरकों तथा जैव नियंत्रण एजेंटों के उपयोग की सिफारिश की। विचार-विमर्श में संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन और आवश्यकता-आधारित उर्वरक उपयोग के सिद्धांतों को भी दोहराया गया तथा विशेष रूप से मत्स्य पालन को शामिल करने वाली समेकित कृषि प्रणालियों में अत्यधिक इनपुट उपयोग से बचने की सलाह दी गई, ताकि पारिस्थितिक संतुलन बना रहे।
कार्यशाला में गोबर खाद, तेल खली तथा स्थानीय जैविक तैयारियों जैसे उपलब्ध संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग पर विशेष जोर दिया गया, जिससे किसान लागत कम करते हुए मृदा की स्थिरता बनाए रख सकें। संसाधनों के कुशल प्रबंधन एवं सतत कृषि पद्धतियों के माध्यम से पंचायत स्तर पर कार्बन न्यूट्रैलिटी की अवधारणा प्रतिभागियों के बीच प्रभावी रूप से उभरी।

व्यावहारिक समझ को बढ़ाने के लिए प्राकृतिक खेती से संबंधित पंचगव्य, जीवामृत, घन जीवामृत, बीजामृत, फिश अमीनो एसिड, नीमास्त्र, अग्नास्त्र और दशपर्णी अर्क जैसे इनपुट्स पर प्रदर्शन पोस्टर प्रदर्शित किए गए, जिससे प्रतिभागियों में विशेष रुचि और सहभागिता देखने को मिली।
इस कार्यक्रम में कुल 36 प्रतिभागियों ने भाग लिया। कार्यशाला का समापन जमीनी स्तर पर इन पहलों को विस्तार देने की साझा प्रतिबद्धता के साथ हुआ। पंचायती राज प्रतिनिधियों को अपने क्षेत्रों में इन प्रथाओं को बढ़ावा देने और प्रसारित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया गया। आईसीएआर–केवीके (सीआईएसएच), मालदा की इस पहल को सतत, किफायती और जलवायु-सहिष्णु पंचायतों को बढ़ावा देने की दिशा में एक दूरदर्शी प्रयास के रूप में सराहा गया।
(स्रोत: भाकृअनुप–कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, कोलकाता)







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