भाकृअनुप–एनआरसीबी, तिरुचिरापल्ली द्वारा जैव विविधता मेला एवं किसान गोष्ठी का आयोजन; पीपीवी एवं एफआरए जागरूकता और केले की आनुवंशिक संरक्षण को बढ़ावा

भाकृअनुप–एनआरसीबी, तिरुचिरापल्ली द्वारा जैव विविधता मेला एवं किसान गोष्ठी का आयोजन; पीपीवी एवं एफआरए जागरूकता और केले की आनुवंशिक संरक्षण को बढ़ावा

27 अप्रैल 2026, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु

भाकृअनुप–राष्ट्रीय केला अनुसंधान केंद्र (एनआरसीबी), तिरुचिरापल्ली, ने आज केले के फील्ड जीन बैंक परियोजना के शुभारंभ के अवसर पर जैव विविधता मेला सह किसान गोष्ठी का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को बौद्धिक संपदा (आपी), पादप किस्मों का संरक्षण एवं किसान अधिकार अधिनियम (पीपीवी एवं एफआऱए) के बारे में जागरूक करना था।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों की उन किस्मों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना था, जिन्हें पीपीवी एवं एफआऱए के तहत पंजीकृत किया जा सकता है। यह पहल केले की आनुवंशिक विविधता के संरक्षण तथा मूल्यवान आनुवंशिक संसाधनों के नुकसान को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है।

इस अवसर पर “भारत सरकार, नई दिल्ली के पीपीवी एवं एफआऱए के अंतर्गत पंजीकृत केले की किस्मों के संरक्षण हेतु फील्ड जीन बैंक” नामक नई परियोजना का उद्घाटन किया गया। उल्लेखनीय है कि यह किसी भी फसल के लिए स्थापित पहला फील्ड जीन बैंक है। यह पहल केले की आनुवंशिक संपदा के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और भविष्य में अन्य फसलों के लिए भी ऐसे जीन बैंक स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करेगी।

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कार्यक्रम में डॉ. टी. मोहापात्रा (अध्यक्ष, पीपीवी एवं एफआऱए), डॉ. डी.के. अग्रवाल (रजिस्ट्रार जनरल, पीपीवी एवं एफआऱए) तथा डॉ. वी.बी. पटेल (सहायक महानिदेशक, भाकृअनुप) मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. टी. मोहापात्रा ने बताया कि बागवानी उत्पादन में लगभग 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उन्होंने फसल सुधार के लिए कृषि जैव विविधता संरक्षण के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि किसान किस्मों के विकास और संरक्षण में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने पीपीवी एवं एफआऱए  अधिनियम (2001) का उल्लेख करते हुए बताया कि यह किसानों की किस्मों और उनके योगदान को मान्यता देता है। इस अधिनियम के अंतर्गत किसानों को सम्मानित और पुरस्कृत किया जाता है—सामुदायिक श्रेणी के लिए ₹10 लाख, व्यक्तिगत किसानों के लिए ₹1 लाख तथा संरक्षण कार्यों के लिए तीन वर्षों में ₹15 लाख तक की सहायता दी जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि खेती में घटती रुचि के कारण आनुवंशिक विविधता पर खतरा है, इसलिए भारत सरकार नारियल, केला और अनार जैसी फसलों के लिए फील्ड जीन बैंक स्थापित करने का समर्थन कर रही है।

डॉ. डी.के. अग्रवाल ने बताया कि पीपीवी एवं एफआऱए अधिनियम पिछले 25 वर्षों से प्रभावी है और यह न केवल नई किस्मों बल्कि पारंपरिक किसान किस्मों के पंजीकरण को भी समर्थन देता है। अब तक 21,500 आवेदनों में से 10,500 से अधिक किस्में पंजीकृत की जा चुकी हैं, जिनमें लगभग 50 प्रतिशत किसान किस्में हैं। उन्होंने यह भी बताया कि किसानों के लिए पंजीकरण निःशुल्क है और कर्नाटक के एक किसान की सफलता कहानी साझा की।

डॉ. वी.बी. पटेल ने पीपीवी एवं एफआऱए अधिनियम के तहत प्रजनकों और किसानों के अधिकारों पर प्रकाश डाला, विशेष रूप से बहुवर्षीय बागवानी फसलों के संदर्भ में, जहां उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि (14.8 गुना तक) हुई है। पीपीवी एवं एफआऱए के विधिक सलाहकार श्री राज गणेश ने किसानों के साथ संवाद कर अधिनियम के महत्व को समझाया और आवेदन प्रक्रिया के बारे में मार्गदर्शन दिया।

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स्वागत संबोधन में भाकृअनुप–एनआरसीबी के निदेशक डॉ. आर. सेल्वराजन ने कार्यक्रम की उपयोगिता और उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अब तक 11 केले की किस्में पंजीकृत की जा चुकी हैं, जिनमें कोल्ली हिल्स की ‘करु वालई’ और नागरकोइल की ‘चिंगन’ जैसी पारंपरिक किस्में शामिल हैं। उन्होंने पीपीवी एवं एफआऱए की भूमिका को पारंपरिक किस्मों के संरक्षण में महत्वपूर्ण बताया। इसके बाद डॉ. टी. मोहापात्रा एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों द्वारा केले के फील्ड जीन बैंक का उद्घाटन किया गया।

जीन बैंक में कुल 19 केले की किस्मों का संरक्षण किया गया है, जिनमें 11 किसान किस्में और 8 नई विकसित किस्में शामिल हैं। इसके पश्चात भाकृअनुप–एनआरसीबी में जैव विविधता मेले का उद्घाटन किया गया, जिसमें 100 से अधिक केले की किस्मों के साथ-साथ विभिन्न तकनीकों और मूल्य संवर्धित उत्पादों का प्रदर्शन किया गया।

कार्यक्रम में संतुलित उर्वरक उपयोग पर भी जागरूकता सत्र आयोजित किए गए, जिसमें बताया गया कि संतुलित उर्वरक उपयोग से उत्पादन पर प्रभाव डाले बिना 25 प्रतिशत तक उर्वरक की बचत की जा सकती है। इस कार्यक्रम में 120 किसानों और वैज्ञानिकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया, जिससे यह आयोजन अत्यंत सफल रहा।

(स्रोत: पीपीवी एवं एफआऱए–राष्ट्रीय केला अनुसंधान केन्द्र, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु)

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