25 सितंबर, 2026, मोतिहारी, बिहार
जारी स्वच्छता ही सेवा (एसएचएस)–2026 अभियान के तहत, भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी ने स्वच्छता, पर्यावरणीय स्थिरता, जन भागीदारी और स्थानीय जल संसाधनों के जिम्मेदार प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए जल निकाय सफाई गतिविधि का आयोजन किया। कार्यक्रम का आयोजन डॉ. राघवेंद्र सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-एमजीएफआरआई, के समग्र मार्गदर्शन में किया गया तथा इसका समन्वय स्वच्छता ही सेवा–2026 के नोडल अधिकारी डॉ. प्रताप एम.जी. ने किया। वैज्ञानिकों, तकनीकी कर्मियों, कर्मचारियों और संस्थान के अन्य कर्मियों ने सफाई गतिविधि में सक्रिय रूप से भाग लिया।
इस पहल का उद्देश्य चिन्हित जल निकाय और उसके आसपास के क्षेत्र की स्वच्छता तथा स्वच्छतापूर्ण स्थिति में सुधार करना था। प्रतिभागियों ने जल निकाय के विभिन्न हिस्सों से जमा हुई खरपतवार, घास, अत्यधिक जलीय वनस्पति, जैविक कचरे और अन्य अवांछित सामग्री को हटाने में सक्रिय रूप से भाग लिया। आसपास के क्षेत्र की भी सफाई की गई, ताकि समग्र पर्यावरण में सुधार हो और कचरे तथा अवांछित वनस्पति के आगे संचय को कम किया जा सके।

इस गतिविधि ने विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों और अन्य जल निकायों की नियमित सफाई तथा टिकाऊ प्रबंधन के महत्व को रेखांकित किया। प्रतिभागियों को जल पारिस्थितिकी तंत्र में ठोस कचरे और अन्य अवांछित सामग्री के अनियंत्रित निपटान को रोकने की आवश्यकता के प्रति जागरूक किया गया। कार्यक्रम में यह भी रेखांकित किया गया कि स्वच्छ और सुव्यवस्थित जल निकायों का महत्वपूर्ण पारिस्थितिक और आजीविका संबंधी महत्व है तथा वे पर्यावरण की गुणवत्ता, जैव विविधता संरक्षण, जल संसाधन प्रबंधन और स्वस्थ ग्रामीण परिवेश में योगदान करते हैं।
प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए डॉ. राघवेंद्र सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-एमजीएफआरआई ने कहा कि जल निकाय मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन और ग्रामीण तथा कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के अभिन्न अंग हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि इनके संरक्षण को केवल समय-समय पर सफाई तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसमें जिम्मेदार उपयोग, प्रदूषण की रोकथाम, आसपास के पर्यावरण का संरक्षण और टिकाऊ प्रबंधन भी शामिल होना चाहिए। उन्होंने संस्थान के कर्मियों और समुदायों को उनके दीर्घकालिक पारिस्थितिक एवं आजीविका संबंधी लाभों के लिए तालाबों तथा अन्य स्थानीय जल संसाधनों की सामूहिक रूप से सुरक्षा करने के लिए प्रोत्साहित किया।
स्वच्छता ही सेवा का महत्व संस्थागत परिसरों के भीतर स्वच्छता बनाए रखने से आगे बढ़कर सामुदायिक स्थलों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में निरंतर भागीदारी की मांग करता है। स्थायी स्वच्छता प्राप्त करने में जन भागीदारी, व्यवहार परिवर्तन और व्यक्तिगत जिम्मेदारी को प्रमुख कारकों के रूप में रेखांकित किया गया। प्रतिभागियों को अभियान के संदेश को नियमित व्यवहार में शामिल करने और स्वच्छ परिवेश बनाए रखने तथा जल संसाधनों की सुरक्षा में योगदान देने के लिए दूसरों को प्रेरित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

इस गतिविधि ने यह प्रदर्शित करके स्वच्छता ही सेवा के जन भागीदारी घटक को मजबूत किया कि स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक जिम्मेदारी, नियमित रखरखाव और निरंतर जागरूकता आवश्यक है। संस्थान के कर्मियों की क्षेत्र-स्तरीय भागीदारी ने यह संदेश भी दिया कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को प्रत्यक्ष और निरंतर कार्रवाई के माध्यम से समर्थन दिया जाना चाहिए।
इस पहल ने स्वच्छता ही सेवा–2026 के व्यापक उद्देश्यों, विशेष रूप से स्वच्छ परिवेश, जिम्मेदार अपशिष्ट प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग को पूरा करने में योगदान दिया। इसने यह भी प्रदर्शित किया कि स्वच्छता के प्रयास कार्यालयों और संस्थागत परिसरों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि खेतों, सामुदायिक स्थलों, तालाबों और व्यापक ग्रामीण परिवेश तक भी विस्तारित होने चाहिए।
जल निकाय सफाई गतिविधि के माध्यम से भाकृअनुप-एमजीएफआरआई ने स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। कार्यक्रम का समापन “स्वच्छता में सहभाग – स्वच्छ भारत, विकसित भारत” के विजन को साकार करने और अधिक स्वच्छ, स्वस्थ तथा पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ ग्रामीण समुदायों के निर्माण की दिशा में निरंतर जन भागीदारी के सामूहिक आह्वान के साथ हुआ।
(स्रोत: भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार)







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