7-9 अक्टूबर, 2026, मोतिहारी, बिहार
भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार ने बिहार कृषि प्रबंधन एवं प्रसार प्रशिक्षण संस्थान (बामेती), पटना द्वारा प्रायोजित “बाढ़ के बाद की परिस्थितियों में दियारा/चौर भूमि में उन्नत फसल प्रबंधन” विषय पर 7-9 अक्टूबर, 2026 तक तीन दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम का उद्देश्य बाढ़ के बाद फसल की पुनर्बहाली, टिकाऊ भूमि एवं जल प्रबंधन, फसल विविधीकरण और बिहार के बाढ़ एवं जलभराव-प्रवण पारिस्थितिकी तंत्र के अनुकूल जलवायु-सहिष्णु कृषि प्रणालियों के संबंध में तकनीकी ज्ञान और व्यावहारिक कौशल को सुदृढ़ करना था।
कार्यक्रम का उद्घाटन 7 अक्टूबर, 2026 को डॉ. राघवेंद्र सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-एमजीआईएफआरआई और डॉ. डी.पी. धीर, उप परियोजना निदेशक, आत्मा, की उपस्थिति में हुआ। उद्घाटन सत्र की शुरुआत दीप प्रज्वलन के साथ हुई, जिसके बाद प्रतिभागियों का स्वागत किया गया और प्रशिक्षण के उद्देश्यों एवं अपेक्षित परिणामों पर परिचयात्मक संवाद हुआ।
डॉ. सिंह ने बिहार के दियारा और चौर पारिस्थितिकी तंत्र में बार-बार आने वाली बाढ़, लंबे समय तक जलभराव और पानी के अनिश्चित निकास से उत्पन्न चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बाढ़ के बाद कृषि की पुनर्बहाली के लिए स्थान-विशिष्ट फसल योजना, मिट्टी में बची नमी का कुशल उपयोग, मृदा स्वास्थ्य में सुधार, समय पर फसल की स्थापना और कृषि उद्यमों का विविधीकरण आवश्यक है। उन्होंने प्रतिभागियों को शून्य जुताई, उपयुक्त कम अवधि वाली फसलों, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और फसल, पशुधन एवं जलीय संसाधनों को समाहित करने वाली कृषि प्रणालियों सहित जलवायु-सहिष्णु प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने उत्पादकता, लाभप्रदता और आजीविका की सहनशीलता में सुधार के लिए वैज्ञानिक ज्ञान को व्यावहारिक एवं किसानोन्मुखी समाधानों में बदलने के महत्व पर भी जोर दिया।

तकनीकी सत्रों में बाढ़ के बाद फसल और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन की व्यापक रणनीतियों को शामिल किया गया, जिनमें बाढ़ के व्यवहार और मौसम-आधारित कृषि परामर्श, फसल एवं मृदा क्षति का आकलन, आकस्मिक फसल योजना, बाढ़ के बाद भूमि की तैयारी, मृदा स्वास्थ्य की पुनर्बहाली और मृदा कार्बन संवर्धन शामिल थे। संसाधन-उपयोग दक्षता में सुधार और समय पर कृषि पुनर्बहाली में सहायता के लिए फसल विविधीकरण, संरक्षण कृषि, शून्य जुताई, संतुलित उर्वरीकरण, कुशल सिंचाई एवं खरपतवार प्रबंधन और एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन पर विशेष जोर दिया गया।
कार्यक्रम में बाढ़ प्रभावित और मौसमी जलभराव वाली भूमि के उत्पादक उपयोग के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस) के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। प्रतिभागियों को स्थानीय भूमि की ऊंचाई, जल उपलब्धता और जलमग्नता की अवधि के अनुसार खेत की फसलों, बागवानी, मत्स्य पालन और जैविक संसाधनों के पुनर्चक्रण को एकीकृत करने के अवसरों से परिचित कराया गया।
चर्चाओं में उपयुक्त भूमि-उपयोग योजना और विविधीकृत कृषि उद्यमों के माध्यम से बाढ़ से संबंधित उत्पादन बाधाओं को अवसरों में बदलने पर ध्यान केंद्रित किया गया। व्यावहारिक समझ को सुदृढ़ करने के लिए भाकृअनुप-एमजीआईएफआरआई अनुसंधान फार्म और कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके), पिपराकोठी में क्षेत्रीय भ्रमण आयोजित किए गए। प्रतिभागियों ने धान–मछली–बत्तख एकीकृत कृषि प्रणाली, जल-आधारित उत्पादन घटकों, वर्मीकम्पोस्टिंग इकाइयों, जैविक संसाधन पुनर्चक्रण पद्धतियों और बागवानी नर्सरी प्रबंधन का अवलोकन किया। इन प्रदर्शनों ने बाढ़-प्रवण क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता, संसाधन पुनर्चक्रण और आजीविका विविधीकरण में सुधार के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकियों के बारे में व्यावहारिक जानकारी प्रदान की।

प्रशिक्षण में वैज्ञानिक अनुशंसाओं को वास्तविक कृषि परिस्थितियों से जोड़ने के लिए संवादात्मक कक्षा चर्चाओं, क्षेत्र-आधारित अवलोकनों और अनुभव साझा करने को भी शामिल किया गया। प्रतिभागियों को स्थानीय रूप से प्रासंगिक चुनौतियों का परीक्षण करने और बाढ़ के बाद समय पर फसल स्थापना, बेहतर पोषक तत्व प्रबंधन तथा भूमि एवं जल संसाधनों के टिकाऊ उपयोग के लिए व्यवहार्य हस्तक्षेपों की पहचान करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
समापन दिवस के तकनीकी कार्यक्रम में बागवानी-आधारित एकीकृत कृषि प्रणालियों, चौर मत्स्य संसाधन प्रबंधन, फल-आधारित विविधीकरण, केवीके के नेतृत्व में प्रौद्योगिकी प्रसार और बाढ़ के बाद कृषि विकास में सहायता करने वाली सरकारी योजनाओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया। इन सत्रों में किसानों के खेत स्तर पर व्यापक रूप से अपनाने की सुविधा के लिए तकनीकी हस्तक्षेपों को प्रसार सेवाओं और संस्थागत सहायता के साथ एकीकृत करने के महत्व पर प्रकाश डाला गया।
तीन दिवसीय प्रशिक्षण ने वैज्ञानिक अनुसंधान, क्षेत्र-स्तरीय प्रदर्शनों और कृषि प्रसार के बीच संबंधों को सुदृढ़ किया तथा बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता की पुनर्बहाली और आजीविका की सहनशीलता बढ़ाने के लिए व्यावहारिक मार्गों को रेखांकित किया। इस पहल के माध्यम से भाकृअनुप-एमजीआईएफआरआई ने दियारा और चौर पारिस्थितिकी तंत्र में टिकाऊ कृषि विकास के लिए जलवायु-सहिष्णु, संसाधन-कुशल और एकीकृत कृषि प्रौद्योगिकियों के विकास एवं प्रसार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि की।
(स्रोत: भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार)







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