2 मार्च, 2026, कोलकाता
भाकृअनुप-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, कोलकाता, में फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम (एफएफपी) की एक दिवसीय क्षेत्रीय समीक्षा कार्यशाला का आयोजन हाइब्रिड मोड में डॉ. प्रदीप डे, निदेशक-सह-अध्यक्ष, क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रबंधन समिति (जेडपीएमसी), एफएफपी की अध्यक्षता में किया गया। कार्यशाला में वर्ष 2025–26 के लिए जोन-V के पाँच एफएफपी केन्द्रों की उपलब्धियों की समीक्षा की गई।
डॉ. आर. रॉय बर्मन, सहायक महानिदेशक (कृषि प्रसार), भाकृअनुप, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अपने संबोधन में उन्होंने व्यवस्थित पुनरावलोकन तथा राज्य विभागों एवं अन्य संबंधित हितधारकों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से प्रौद्योगिकियों के विस्तार की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने जोन-V के अंतर्गत प्रौद्योगिकियों की सूची तैयार करने एवं साझा करने की भी बात कही। उन्होंने पोषण सुरक्षा, जलवायु लचीलापन तथा उद्यमिता-आधारित व्यवसाय मॉडल के विकास को सुनिश्चित करने हेतु पूरे गाँव के दृष्टिकोण को अपनाने की वकालत की। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि लगभग एक दशक पूरा कर चुके एफएफपी केंद्रों को उपयुक्त निकास योजना तैयार करनी चाहिए तथा परियोजना पूर्ण होने के बाद भी अपनाए गए क्लस्टरों में निरंतरता एवं स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए स्थायित्व कोष का निर्माण करना चाहिए।

डॉ. टी.के. दत्ता, कुलपति, पश्चिम बंगाल पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय (डब्ल्यूबीयूएएफएस), कोलकाता, विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने परियोजना क्षेत्र में बकरियों में कृत्रिम गर्भाधान शुरू करने हेतु डब्ल्यूबीयूएएफएस की एफएफपी टीम की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि नए परियोजना क्षेत्रों में विस्तार से पहले मौजूदा क्लस्टर में सभी एफएफपी मॉड्यूल का संतृप्ति स्तर तथा एक सुव्यवस्थित निकास योजना सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने परिषद एवं कृषि प्रसार प्रभाग द्वारा डब्ल्यूबीयूएएफएस, कोलकाता, को एक नया एफएफपी केन्द्र स्वीकृत करने के लिए आभार भी व्यक्त किया।
भाकृअनुप-भारतीय जल प्रबंधन संस्थान से डॉ. ए. सारंगी, भाकृअनुप-केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान से डॉ. जी. ए. के. कुमार, निदेशालय (अनुसंधान, प्रसार एवं फार्म्स) (डीआरईएफ), डब्ल्यूबीयूएएफएस, कोलकाता से डॉ. एस. बटाब्याल तथा ओडिशा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से प्रो. पी. जे. मिश्रा, डीन (प्रसार शिक्षा) अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। पाँचों एफएफपी केन्द्रों के प्रधान अन्वेषक, सह-अन्वेषक एवं वरिष्ठ अनुसंधान फेलो ने भी ऑनलाइन भाग लिया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. प्रदीप डे ने फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम के प्रमुख घटकों—फार्म, नवाचार, संसाधन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी—पर प्रकाश डाला तथा जोन-V में इस कार्यक्रम के महत्व एवं प्रभाव को विस्तार से बताया। उन्होंने एफएफपी के किसान-केंद्रित दृष्टिकोण को रेखांकित किया, जिसमें किसान प्रौद्योगिकियों के सह-विकासकर्ता के रूप में कार्य करते हैं। उन्होंने विभिन्न कृषि-पारिस्थितिकी स्थितियों में प्रौद्योगिकियों की उपयुक्तता का आकलन करने तथा एफएफपी के छह मॉड्यूल के अंतर्गत उनके प्रभाव एवं अपनाने की प्रक्रिया का मूल्यांकन करने पर भी बल दिया।
प्रो. एस. बटाब्याल ने डब्ल्यूबीयूएएफएस, कोलकाता, में एफएफपी केन्द्र स्वीकृत करने के लिए परिषद की सराहना की और आश्वासन दिया कि परियोजना को निर्धारित समय-सीमा में लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु एफएफपी दिशानिर्देशों के अनुसार क्रियान्वित किया जाएगा।
प्रो. पी. जे. मिश्रा ने लचीली किस्मों के उपयोग द्वारा फसल विविधीकरण के महत्व पर बल दिया तथा सोशल मीडिया, ड्रोन प्रौद्योगिकी एवं अन्य उन्नत तकनीकों सहित डिजिटल कृषि को बढ़ावा देने की वकालत की।

डॉ. जी. ए. के. कुमार ने एफएफपी के दायरे का विस्तार करते हुए गाँवों या केन्द्रों की संख्या बढ़ाने का सुझाव दिया। उन्होंने राज्य सरकारों द्वारा एफएफपी मॉडल को अपनाने की रणनीति विकसित करने, उद्यमिता विकास को सुदृढ़ करने तथा कृषि-व्यवसाय इनक्यूबेटरों के साथ एकीकरण पर भी बल दिया।
डॉ. ए. सारंगी ने कृषि प्रौद्योगिकी के प्रसार में मोबाइल ऐप्स के उपयोग को रेखांकित किया तथा कृषि-जलवायु दृष्टिकोण से कृषि-परिस्थितिक दृष्टिकोण की ओर संक्रमण को सुगम बनाने हेतु भू-स्थानिक डाटाबेस विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने एफएफपी मॉडल को भारत सरकार की विभिन्न योजनाओं के साथ एकीकृत करने की भी सिफारिश की, जिससे अधिक प्रभाव प्राप्त हो सके।
तकनीकी सत्र के दौरान पाँचों मौजूदा एफएफपी केन्द्रों के सभी प्रधान एवं सह-अन्वेषकों ने वर्ष 2025–26 के लिए अपनी भौतिक एवं वित्तीय उपलब्धियों को प्रस्तुत किया। इन प्रस्तुतियों की गणमान्य व्यक्तियों एवं पैनल सदस्यों द्वारा समालोचनात्मक समीक्षा की गई।
कार्यशाला में कुल 45 प्रतिभागियों ने शिरकत की।
(स्रोत: भाकृअनुप-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, कोलकाता)







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