29 मई, 2026, कर्नाटक
भाकृअनुप-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान, अनुसंधान केन्द्र, बल्लारी, कर्नाटक, द्वारा आज एमजीएमजी कार्यक्रम तथा जनजातीय उप-योजना (टीएसपी) के अंतर्गत कर्नाटक के बल्लारी जिले के सांडूर ब्लॉक के मट्टाजनहल्ली गांव में “इन-सीटू हरी खाद: जैविक पदार्थ एवं उर्वरता में वृद्धि” विषय पर एक जागरूकता अभियान आयोजित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मृदा के जैविक पदार्थ, मृदा उर्वरता, फसल उत्पादकता तथा कृषि अर्थव्यवस्था में हरी खाद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए किया गया। सनई (Sunnhemp), ढैंचा (Daincha), लोबिया (Cowpea) तथा उड़द (Black Gram) जैसी हरी खाद फसलों के लाभों की जानकारी दी गई, जिसमें स्थानीय कृषि प्रणालियों में सनई एवं ढैंचा के उपयोग पर विशेष बल दिया गया। पोषक तत्वों की आपूर्ति, नाइट्रोजन स्थिरीकरण तथा मृदा की जैविक गुणवत्ता में वृद्धि में हरी खाद की भूमिका का विस्तार से वर्णन किया गया। किसानों को दीर्घकालिक मृदा उत्पादकता एवं स्थिरता में सुधार हेतु नियमित रूप से हरी खाद प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

वरिष्ठ वैज्ञानिक (वानिकी) ने खेत की मेड़ों पर उपलब्ध स्थानीय जीवित बाड़ों तथा हरी पत्ती खाद प्रजातियों के उपयोग के महत्व पर चर्चा की, जो कृषि भूमि में जैविक पदार्थ की वृद्धि के लिए उपयोगी हैं। उन्होंने Gliricidia sepium (स्थानीय रूप से गोब्बरदा गिड्डा के नाम से प्रसिद्ध), Pongamia pinnata, Leucaena leucocephala (सुबबूल), Albizia amara, Sesbania grandiflora तथा Erythrina variegata जैसी प्रजातियों की नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता एवं लाभों पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हरी खाद फसलों जैसे कुल्थी, हेज लूसर्न तथा Stylosanthes scabra का भी परिचय कराया।
संवाद सत्र के दौरान उन्होंने बताया कि किसान स्थानीय रूप से उपलब्ध जैविक संसाधनों का प्रभावी उपयोग कर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर सकते हैं तथा टिकाऊ तरीके से मृदा उर्वरता में सुधार कर सकते हैं। उन्होंने किसानों को यह भी सलाह दी कि वे अपनी कृषि भूमि में उत्पन्न भेड़ एवं बकरी की खाद को बाहर बेचने के बजाय मृदा उत्पादकता बनाए रखने के लिए उपयोग करें।

कार्यक्रम का समापन वैज्ञानिकों एवं किसानों के बीच सक्रिय संवाद के साथ हुआ, जिसमें सतत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन तथा कृषि उत्पादकता में सुधार के लिए इन-सीटू हरी खाद प्रथाओं के महत्व को पुनः रेखांकित किया गया।
जागरूकता कार्यक्रम में कुल 56 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 15 पुरुष एवं 41 महिला किसान शामिल थे।
(स्रोत: भाकृअनुप-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान, देहरादून)







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