भाकृअनुप-आईआईएसडब्ल्यूसी अनुसंधान केन्द्र, कोटा ने एमजीएमजी कार्यक्रम के अंतर्गत कोटा जिले के किशनपुरा टाकिया गांव में जागरूकता कार्यक्रम का किया आयोजन

भाकृअनुप-आईआईएसडब्ल्यूसी अनुसंधान केन्द्र, कोटा ने एमजीएमजी कार्यक्रम के अंतर्गत कोटा जिले के किशनपुरा टाकिया गांव में जागरूकता कार्यक्रम का किया आयोजन

26 मई, 2026, कोटा

भाकृअनुप–भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (आईआईएसडब्ल्यूसी), अनुसंधान केन्द्र, कोटा, ने भारत सरकार के संतुलित उर्वरक उपयोग अभियान के अंतर्गत आज राजस्थान के कोटा जिले के किशनपुरा टाकिया गांव में ‘मृदा स्वास्थ्य सुधार एवं संतुलित फसल पोषण’ विषय पर एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। बैठक का मुख्य विषय “मृदा स्वास्थ्य कार्ड कार्ययोजना: परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन” था।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को मृदा स्वास्थ्य बनाए रखने और संतुलित फसल पोषण के लिए सतत पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों के प्रति जागरूक करना था। कार्यक्रम के दौरान पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार, उपयोग किए गए आदानों की दक्षता बढ़ाने तथा फसल पोषण के लिए रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के विषय पर एक तकनीकी व्याख्यान दिया गया। किसानों को प्राकृतिक खेती की पद्धतियों के बारे में भी जानकारी प्रदान की गई।

किशनपुरा टाकिया गांव के किसानों को दीर्घकालिक मृदा उर्वरता बनाए रखने तथा फसल उत्पादन को स्थिर रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ पोषक तत्वों के जैविक एवं जैव स्रोतों को मिलाकर एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) दृष्टिकोण अपनाने के महत्व के बारे में जागरूक किया गया।

ICAR-IISWC RC, Kota Organises Awareness Programme in Kishanpura Takia village of Kota district under MGMG programme

किसानों को सलाह दी गई कि वे अपनी कृषि प्रणाली में गोबर की खाद (एफवाईएम), वर्मी कम्पोस्ट, हरित खाद, फार्म ऑर्गेनिक मैन्योर (एफओएम), ब्राउन मैन्योरिंग तथा फसल अवशेषों जैसे विभिन्न जैविक पोषक स्रोतों को शामिल करें, जिससे मृदा में जैविक कार्बन की मात्रा, मृदा संरचना तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार हो सके।

फसल अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन पर विशेष जोर दिया गया। किसानों को सलाह दी गई कि वे कटाई के तुरंत बाद मोल्ड बोर्ड (एमबी) हल का उपयोग करके फसल अवशेषों को मिट्टी में मिला दें। इससे पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण होता है, मृदा में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ती है तथा खेतों में अवशेषों के संचय की समस्या का समाधान होता है। इस पद्धति को मृदा स्वास्थ्य सुधारने, पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण को बढ़ाने तथा पर्यावरणीय रूप से सतत कृषि को प्रोत्साहित करने की एक प्रभावी रणनीति के रूप में रेखांकित किया गया।

कार्यक्रम का समापन एक संवादात्मक चर्चा सत्र के साथ हुआ, जिसमें किसानों ने अपने अनुभव साझा किए तथा मृदा उर्वरता प्रबंधन एवं संतुलित उर्वरक उपयोग से संबंधित मार्गदर्शन प्राप्त किया। प्रतिभागियों ने प्रदान की गई व्यावहारिक सिफारिशों की सराहना की तथा मृदा स्वास्थ्य और फसल उत्पादकता में सुधार के लिए सुझाई गई पद्धतियों को अपनाने में गहरी रुचि व्यक्त की। कार्यक्रम में 40 किसानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया।

(स्रोत: भाकृअनुप-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (आईआईएसडब्ल्यूसी), अनुसंधान केन्द्र, उदगमंडलम, तमिलनाडु)

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