बिहार में खेत बचाओ अभियान के तहत भाकृअनुप-एमजीआईएफआरआई, मोतिहारी ने मृदा स्वास्थ्य केन्द्रित बाग प्रबंधन को दिया बढ़ावा

बिहार में खेत बचाओ अभियान के तहत भाकृअनुप-एमजीआईएफआरआई, मोतिहारी ने मृदा स्वास्थ्य केन्द्रित बाग प्रबंधन को दिया बढ़ावा

25 जून, 2026, मोतिहारी, बिहार

राष्ट्रव्यापी खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप–एमजीएफआरआई), मोतिहारी, के वैज्ञानिकों ने बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के चकिया प्रखंड के चिंतामनपुर गांव में किसान जागरूकता सह प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कृषि लाभप्रदता एवं दीर्घकालिक कृषि स्थिरता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, संतुलित पोषक तत्व उपयोग, पर्यावरण-अनुकूल कीट प्रबंधन तथा टिकाऊ बाग उत्पादन प्रणालियों को बढ़ावा देना था।

प्रतिभागियों को उर्वरकों के उपयोग के आधार के रूप में मृदा परीक्षण के महत्व के बारे में जागरूक किया गया। उन्हें सलाह दी गई कि उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग न करें, क्योंकि अत्यधिक एवं असंतुलित उर्वरक प्रयोग से न केवल खेती की लागत बढ़ती है, बल्कि मृदा के पोषक तत्वों का संतुलन भी बिगड़ता है और दीर्घकाल में मृदा की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

किसानों को मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने तथा रासायनिक उर्वरकों के साथ गोबर की सड़ी खाद (एफवाईएम), वर्मी कम्पोस्ट, हरित खाद, फसल अवशेष पुनर्चक्रण तथा जैव उर्वरकों जैसे जैविक स्रोतों को एकीकृत करने के लिए प्रेरित किया गया। इस बात पर विशेष बल दिया गया कि इन समेकित उपायों से मृदा में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, मृदा संरचना में सुधार होता है, पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है तथा मृदा की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है।

क्षेत्र की दो प्रमुख फल फसलों आम एवं लीची के बागों में पोषक तत्व प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया। किसानों को सलाह दी गई कि उर्वरकों का प्रयोग तने के पास करने के बजाय वृक्ष की छत्रछाया (कैनोपी) के नीचे गोलाकार खाइयों में करें, जिससे पोषक तत्वों का बेहतर अवशोषण हो सके। आम के बागों के लिए गोबर की सड़ी खाद के साथ नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश की अनुशंसित मात्रा के संतुलित उपयोग पर बल दिया गया, जबकि अत्यधिक नाइट्रोजन प्रयोग से बचने की सलाह दी गई, क्योंकि इससे पुष्पन एवं फलन की अपेक्षा केवल वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है।

लीची के बागों के लिए वैज्ञानिकों ने कटाई के बाद गोबर की सड़ी खाद, फॉस्फोरस एवं पोटाश के प्रयोग की अनुशंसा की, जबकि नाइट्रोजन को विभाजित मात्रा (स्प्लिट डोज़) में देने की सलाह दी, ताकि नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ाई जा सके। किसानों को जहां उपलब्ध हो, वहां मृदा स्वास्थ्य सुधारने एवं मृदा जनित कीटों की समस्या कम करने के लिए नीम खली एवं करंज खली जैसे जैविक संशोधकों के उपयोग के लिए भी प्रेरित किया गया।

ICAR-MGIFRI, Motihari promotes soil-health-centered orchard management under Khet Bachao Abhiyan in Bihar

प्रतिभागियों को मृदा एवं जल संरक्षण उपायों के महत्व के बारे में जागरूक किया गया, जिनमें उचित भूमि समतलीकरण, खेत की मेड़ों को मजबूत बनाना तथा खेत में ही वर्षा जल संरक्षण (इन-सीटू) शामिल थे। किसानों को रोटावेटर के बार-बार एवं अत्यधिक उपयोग से बचने की भी सलाह दी गई, क्योंकि लगातार उथली जुताई से हल चलाने की गहराई के नीचे कठोर परत (हार्ड पैन) बन जाती है, जिससे जड़ों की वृद्धि बाधित होती है, जल का अवशोषण कम होता है तथा फसलों द्वारा पोषक तत्वों का ग्रहण सीमित हो जाता है।

कीट प्रबंधन सत्र के दौरान खेतों एवं बागों में कीट एवं रोगों के प्रबंधन के लिए पर्यावरण-अनुकूल उपायों पर विशेष बल दिया गया। किसानों को नियमित खेत निरीक्षण, समय पर कीट पहचान, नीम आधारित उत्पादों, वनस्पति अर्क, जैव कीटनाशकों तथा लाभकारी कीटों के संरक्षण जैसे समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) उपाय अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।

आम एवं लीची के बागों के लिए बाग की स्वच्छता बनाए रखने, संक्रमित शाखाओं की छंटाई करने, कीटग्रस्त पौध भागों को हटाने तथा जैविक नियंत्रण उपायों के उपयोग के महत्व पर प्रकाश डाला गया, ताकि रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करते हुए कीटों का प्रभाव प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सके।

वैज्ञानिकों ने किसानों के साथ पोषक तत्वों की कमी, बागों की घटती उत्पादकता, जलभराव, मृदा सघनीकरण, जैविक खाद के उपयोग तथा कीट प्रबंधन संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा की। इन समस्याओं के समाधान के लिए व्यावहारिक एवं लागत प्रभावी, स्थान-विशिष्ट अनुशंसाएं भी प्रदान की गईं।

कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि स्वस्थ मृदा, संतुलित पोषण, जैविक पदार्थ प्रबंधन, पर्यावरण-अनुकूल कीट नियंत्रण तथा संरक्षण आधारित कृषि पद्धतियां बिहार में फसलों एवं बागों की उत्पादकता बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

किसानों ने वैज्ञानिक मार्गदर्शन की सराहना की तथा खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत प्रोत्साहित मृदा स्वास्थ्य केंद्रित पोषक तत्व प्रबंधन, समेकित कीट प्रबंधन तथा संसाधन संरक्षण उपायों को अपनाने की इच्छा व्यक्त की।

इस कार्यक्रम ने टिकाऊ कृषि के प्रति किसानों की जागरूकता को सुदृढ़ किया तथा उत्पादक, लाभकारी एवं जलवायु-लचीली कृषि प्रणालियों की आधारशिला के रूप में मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के महत्व को पुनः रेखांकित किया।

कार्यक्रम में कुल 29 किसानों, जिनमें 22 पुरुष एवं 7 महिला प्रतिभागी शामिल थे, ने सक्रिय रूप से भाग लिया तथा मृदा उर्वरता, बाग प्रबंधन, पोषक तत्वों की कमी, कीट प्रबंधन एवं जल संरक्षण से संबंधित विषयों पर वैज्ञानिकों के साथ संवाद किया।

(स्रोत: भाकृअनुप–महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार)

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