खाद्य तेलों के आयात में कमी के लिए अधिक उत्पादन वाली किस्मों के विकास में तेजी लाने की आवश्यकता- डॉ. देवेन्द्र कुमार यादव
20 अक्टूबर, 2026, भरतपुर
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान, भरतपुर का 33वाँ स्थापना दिवस समारोह उत्साहपूर्वक आयोजित किया गया। समारोह में राई-सरसों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता बढ़ाने, उन्नत किस्मों के विकास और खाद्य तेलों के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में संस्थान के वैज्ञानिक योगदान पर चर्चा की गई।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. देवेन्द्र कुमार यादव, एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उपमहानिदेशक (फसल विज्ञान), ने ऑनलाइन माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि भारत सरकार खाद्य तेलों के आयात में कमी लाने के लिए प्रयासरत है। इसके लिए राई-सरसों सहित प्रमुख तिलहनी फसलों की उत्पादकता बढ़ाना आवश्यक है। उन्होंने संस्थान में किए जा रहे वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि बदलती जलवायु परिस्थितियों और खाद्य तेलों की बढ़ती मांग को देखते हुए अधिक उत्पादन क्षमता वाली किस्मों के विकास तथा उनके प्रसार में तेजी लाने की आवश्यकता है।
समारोह में डॉ. एस.के. झा, सहायक महानिदेशक (तिलहन एवं दलहन), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद; पद्मश्री प्रो. अरविंद कुमार, पूर्व कुलपति, रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाँसी; डॉ. मनीष कुमार चेतली, निदेशक, केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, मखदूम; डॉ. विश्वनाथन चिन्नुसामी, निदेशक अनुसंधान, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली; डॉ. पी.के. राय, निदेशक, राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान, रायपुर; डॉ. एस.के. बेरा, निदेशक, भारतीय मूंगफली अनुसंधान संस्थान; संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. भूरी सिंह एवं डॉ. धीरज सिंह तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. देशराज सिंह, अतिरिक्त निदेशक (तिलहन एवं दलहन), उपस्थित रहे।

डॉ. एस.के. झा, सहायक महानिदेशक (तिलहन एवं दलहन), ने संस्थान द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों में किए जा रहे प्रसार कार्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि उन्नत किस्मों के बीजों और बेहतर कृषि तकनीकों के उपयोग से देश में सरसों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने खाद्य तेलों की घरेलू मांग और आयात पर निर्भरता को देखते हुए उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों को और गति देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्पीड ब्रीडिंग, जीन एडिटिंग और जीनोमिक सलेक्शन जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाकर कम समय में अधिक उत्पादन क्षमता वाली उन्नत सरसों किस्मों का विकास किया जाना चाहिए। इससे देश की खाद्य तेल संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति और आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।
इस अवसर पर डॉ. विश्वनाथन चिन्नुसामी ने ‘जीनोम एडिटिंग इन रेपसीड-मस्टर्ड: प्रोग्रेस एंड पर्सपेक्टिव’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने राई-सरसों के आनुवंशिक सुधार में जीनोम एडिटिंग की संभावनाओं और इस क्षेत्र में हो रही अनुसंधान प्रगति पर प्रकाश डाला।
समारोह में राई-सरसों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में सुधार, रोग प्रतिरोधी किस्मों के विकास और किसानों तक उन्नत कृषि तकनीकों को पहुँचाने में वैज्ञानिक अनुसंधान की भूमिका को रेखांकित किया गया। वक्ताओं ने तिलहनी फसलों के अनुसंधान एवं विकास को सुदृढ़ करने तथा देश की खाद्य तेल संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निरंतर प्रयास करने पर जोर दिया।
कार्यक्रम के अंतर्गत वैज्ञानिक-किसान संवाद भी आयोजित किया गया। इसमें वैज्ञानिकों ने किसानों से बातचीत कर सरसों की खेती में आने वाली समस्याओं, उत्पादन संबंधी चुनौतियों और उनकी आवश्यकताओं के बारे में जानकारी प्राप्त की। इस संवाद के माध्यम से किसानों की व्यावहारिक समस्याओं को अनुसंधान की प्राथमिकताओं से जोड़ने तथा उनके समाधान के लिए वैज्ञानिक प्रयासों को दिशा देने पर बल दिया गया।
इस अवसर पर उत्कृष्ट कार्य एवं उल्लेखनीय योगदान के लिए संस्थान के वैज्ञानिकों एवं कार्मिकों डॉ. भागीरथ राम, डॉ. एच.एस. मीना, डॉ. हरिओम शर्मा, डॉ. एम.डी. मीना, डॉ. हरवीर सिंह, श्री करनाल सिंह, श्री आर.सी. मीना, सुश्री प्रियंका गुप्ता, श्री आशाराम चौधरी, सुश्री विमला मीना तथा श्रीमती वीणा शर्मा को सम्मानित किया गया।
डॉ. एन.आर. भारद्वाज को संस्थान के सर्वोत्तम वैज्ञानिक का पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त, भरतपुर जिले के प्रगतिशील किसानों श्री हरिओम कुमार, श्री राम भरोसी, श्री गोपाल सिंह, श्री हेतराम मुद्गल, श्री बसंत राम, श्री वीरेश भागोर, श्री सूरज भर, श्री रणवीर सिंह तथा श्रीमती सुनीता देवी को कृषि क्षेत्र में उनके योगदान के लिए प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
समारोह के दौरान ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के अंतर्गत पौधरोपण भी किया गया। इस पहल के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, हरित परिसर के विकास और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश दिया गया।
संस्थान का 33वाँ स्थापना दिवस समारोह वैज्ञानिक उपलब्धियों की समीक्षा, भविष्य की अनुसंधान प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श तथा राई-सरसों सहित अन्य तिलहनी फसलों के विकास के माध्यम से देश की खाद्य तेल संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति में योगदान देने के संकल्प के साथ संपन्न हुआ।
(स्रोतः भाकृअनुप- भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान, भरतपुर)








Like on Facebook
Subscribe on Youtube
Follow on X X
Like on instagram