29 जून, 2026, चेन्नई
भाकृअनुप-केन्द्रीय लवणीय जल जलीय कृषि संस्थान (भाकृअनुप-सीबा), चेन्नई, ने आज चेन्नई में ‘जलीय कृषि भूमि उपयोग योजना – अंतराल, चुनौतियाँ और आगे की राह’ विषय पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला में श्री देवसेनापति, आईएएस, सदस्य सचिव, तटीय जलीय कृषि प्राधिकरण (सीएए), डॉ. चेल्सासिनी, निदेशक, मत्स्यपालन डॉ. पी. कृष्णन, निदेशक, बंगाल की खाड़ी कार्यक्रम, डॉ. मोहम्मद कोया, मत्स्य विकास आयुक्त, भारत सरकार, भाकृअनुप-सीआईबीए के डॉ. ए.जी. पोनैयाह, पूर्व निदेशक, भाकृअनुप-सीबा, डॉ. कुलदीप के. लाल, निदेशक, भाकृअनुप-सीबा तटीय राज्यों के अधिकारी, झींगा उद्योग के प्रतिनिधि तथा सीबा के वैज्ञानिकों ने भाग लिया।
श्री देवसेनापति, आईएएस, सचिव, तटीय जलीय कृषि प्राधिकरण (सीएए), ने रेखांकित किया कि प्रत्येक राज्य, जो जलीय कृषि को बढ़ावा देना चाहता है, उसे जलीय कृषि योजना से जुड़े विवादों और अन्य समस्याओं को कम करने के लिए रेस्पॉन्सिबल एक्वाकल्चर ज़ोन प्लानिंग (आरएजेडपी) से शुरुआत करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उचित योजना संसाधनों के कुशल उपयोग में सहायता करती है और आरएजेडपी इसके लिए एक रूपरेखा (ब्लूप्रिंट) है। आरएजेडपी नियामक दिशानिर्देशों में मध्यावधि सुधार करने में भी सहायता कर सकता है, जिन्हें राज्य-विशिष्ट होना चाहिए।

डॉ. कुलदीप के. लाल ने अपने संदर्भ प्रस्तुतीकरण में कहा कि आरएजेडपी क्षेत्र एवं प्रजाति आधारित ज़ोन निर्धारण में सहायता करता है, जिसमें जलीय कृषि स्थलों की ट्रेसबिलिटी भी शामिल है। इससे कृषि जैसे अन्य प्राथमिक उत्पादन क्षेत्रों के साथ भूमि उपयोग संबंधी विवादों से बचते हुए खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन करने वाली सुव्यवस्थित जलीय कृषि को बढ़ावा मिलता है।
डॉ. मोहम्मद कोया, मत्स्य विकास आयुक्त, भारत सरकार, ने कहा कि आरएजेडपी, सीबा द्वारा विकसित किए गए सर्वोत्तम परिणामों में से एक है। उन्होंने सुझाव दिया कि आरएजेडपी की कार्यप्रणाली को व्यापक विचार-विमर्श के लिए भारत सरकार के मत्स्य मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है तथा इसका व्यापक स्तर पर विस्तार संभव है।
डॉ. पी. कृष्णन, निदेशक, बंगाल की खाड़ी कार्यक्रम (बाओबीपी), ने कहा कि तटीय जलीय कृषि प्राधिकरण (सीएए) को आरएजेडपी तथा इसकी कार्यप्रणाली को वैधता प्रदान करनी चाहिए, ताकि विकास विभाग जलीय कृषि योजना के लिए आरएजेडपी को अपनाने में सक्षम हो सकें।

भाकृअनुप-सीआईबीए ने जलीय कृषि के विस्तार के लिए संभावित भूमि संसाधनों की पहचान करने हेतु रेस्पॉन्सिबल एक्वाकल्चर ज़ोन प्लानिंग (आरएजेडपी) टूल किट विकसित किया है। आरएजेडपी ढांचा व्यवस्थित रूप से पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील तथा प्रतिबंधित क्षेत्रों को बाहर रखता है और उपग्रह चित्रों से प्राप्त भूमि उपयोग एवं भूमि आवरण, जल की गुणवत्ता एवं उपलब्धता, मृदा की विशेषताएँ, वर्तमान नियामक ढाँचे तथा क्षेत्रीय सत्यापन सहित अनेक प्रकार के आंकड़ों को एकीकृत करता है। यह संसाधनों की उपलब्धता, विशेष रूप से जल स्रोतों के आधार पर उपयुक्त क्षेत्रों की पहचान करता है तथा उन भूमि क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है जो वर्तमान में लवणीय प्रभाव से प्रभावित, अनुपजाऊ अथवा कृषि के लिए अनुपयुक्त हैं।
मौजूदा जलीय कृषि फार्मों का मानचित्रण उनके भौगोलिक वितरण एवं विस्तार की जानकारी प्रदान करता है, जबकि संभावित क्षेत्रों की पहचान भविष्य में पर्यावरणीय क्षरण या उपयोगकर्ता संघर्ष उत्पन्न किए बिना विस्तार के लिए उपयुक्त क्षेत्रों को चिन्हित करती है। आरएजेडपी ढांचे को तमिलनाडु, पुडुचेरी, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में लागू किया जा चुका है तथा इसे अन्य तटीय राज्यों तक विस्तारित करने की योजना है। इस कार्यशाला का आयोजन राज्यों को जलीय कृषि योजना के लिए आरएजेडपी टूल किट के प्रति संवेदनशील बनाने तथा राज्यों में उत्तरदायी जलीय कृषि विकास से जुड़े राज्य-विशिष्ट मुद्दों पर विचार-विमर्श करने के उद्देश्य से किया गया।

डॉ. ए.जी. पोनैयाह ने कहा कि आरएजेडपी ढांचा वैज्ञानिक जानकारी को प्रभावी रूप से एक व्यावहारिक निर्णय-सहायक भाषा में परिवर्तित करता है, जो राज्य की नियामक एजेंसियों की आवश्यकताओं को पूरा करती है।
कार्यशाला के दौरान भाकृअनुप–केन्द्रीय लवणीय जल जलीय कृषि संस्थान तथा तटीय जलीय कृषि प्राधिकरण (सीएए) के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते का उद्देश्य तकनीकी सामग्री तैयार करने तथा प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से तटीय जलीय कृषि प्रौद्योगिकियों के प्रचार-प्रसार में सहयोग को सुदृढ़ करना है, जिससे हितधारकों के बीच इनका व्यापक प्रसार एवं पहुंच सुनिश्चित की जा सके।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय लवणीय जल जलीय कृषि संस्थान, चेन्नई)







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