एक महत्वपूर्ण अनुसंधान-आधारित उपलब्धि के तहत, भाकृअनुप–केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-सीएमएफआरआई), कोच्चि ने महाराष्ट्र के मछुआरों और जनजातीय समुदायों को हैचरी में उत्पादित अतिरिक्त पांच लाख ग्रीन मसल (हरी सीप) बीजों की आपूर्ति की है। इसके साथ ही वर्ष 2026 में कुल बीज आपूर्ति बढ़कर 10 लाख हो गई है।
2–4 मिलीमीटर आकार के ग्रीन मसल बीजों का उत्पादन प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) परियोजना के अंतर्गत तिरुवनंतपुरम स्थित सीएमएफआरआई के विझिंजम क्षेत्रीय केंद्र की द्विकपाटी (Bivalve) हैचरी में किया गया।

इसके साथ ही मद्रास क्षेत्रीय केन्द्र में उत्पादित अतिरिक्त एक लाख सीप के बीजों की भी महाराष्ट्र को आपूर्ति की गई, जिससे राज्य में सीप पालन की संभावनाओं को बढ़ावा मिला।
डॉ. ग्रिन्सन जॉर्ज, निदेशक, भाकृअनुप-सीएमएफआरआई, ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य महाराष्ट्र के तट पर टिकाऊ द्विकपाटी पालन को बढ़ावा देकर समुद्री मत्स्य अनुसंधान को आजीविका के अवसरों में बदलना है।
ग्रीन मसल और सीप दोनों के संयुक्त संवर्धन से मछुआरों और जनजातीय समुदायों के लिए आजीविका के अवसरों में विविधता आने तथा विज्ञान-आधारित तटीय जलीय कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।

इस परियोजना के तहत, डॉ. एम.के. अनिल, प्रधान वैज्ञानिक, के नेतृत्व में भाकृअनुप-सीएमएफआरआई की वैज्ञानिक टीम ने महाराष्ट्र के मैंग्रोव सेल के 30 सरकारी अधिकारियों को मसल तथा सीप के नर्सरी पालन एवं संवर्धन की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षित अधिकारियों से स्थानीय समुदायों तक व्यावहारिक ज्ञान तथा पालन प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण में सहायता मिलने की उम्मीद है।
महाराष्ट्र में मैंग्रोव एवं समुद्री जैव विविधता संरक्षण फाउंडेशन किसानों की भागीदारी का समन्वय कर रहा है तथा बीज आपूर्ति और तकनीकी मार्गदर्शन को पालन गतिविधियों से जोड़ रहा है। इस परियोजना को केंद्रीय मत्स्य पालन विभाग का सहयोग प्राप्त है।
द्विकपाटी पालन की संभावनाएं

द्विकपाटी पालन कम निवेश और कम परिचालन लागत वाली तकनीक है, जिसमें पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को बनाए रखते हुए तटीय आजीविका को मजबूत करने की महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं। उपयुक्त क्षेत्रों में स्थापित होने के बाद, अनुकूल जल गुणवत्ता और पर्यावरणीय परिस्थितियों में मसल और सीप को न्यूनतम बाहरी आदानों की आवश्यकता होती है। उचित स्थल चयन, निगरानी और कटाई की पद्धतियों के साथ यह दृष्टिकोण मछुआरों और स्थानीय समुदायों, विशेष रूप से तटीय एवं मैंग्रोव क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए टिकाऊ आजीविका के अवसर प्रदान कर सकता है।
मैंग्रोव पुनर्स्थापन पहलों के साथ एकीकृत किए जाने पर द्विकपाटी पालन पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण में सहायता कर सकता है, क्योंकि ये फिल्टर-फीडिंग जीव जल की गुणवत्ता सुधारने में मदद करते हैं। इस प्रकार, द्विकपाटी पालन एक आशाजनक प्रकृति-आधारित दृष्टिकोण है, जो आजीविका सृजन, टिकाऊ जलीय कृषि और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन को एक साथ जोड़ता है।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, कोच्चि)








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