भाकृअनुप-सीआईएआरआई और भाकृअनुप-केवीके, दक्षिण अंडमान ने संयुक्त रूप से भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र, सिप्पीघाट में सूकर पालन पर प्रशिक्षण कार्यक्रम का किया आयोजन

भाकृअनुप-सीआईएआरआई और भाकृअनुप-केवीके, दक्षिण अंडमान ने संयुक्त रूप से भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र, सिप्पीघाट में सूकर पालन पर प्रशिक्षण कार्यक्रम का किया आयोजन

18-20 अगस्त, 2026, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह

भाकृअनुप-केन्द्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पोर्ट ब्लेयर द्वारा भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र, सिप्पीघाट (दक्षिण अंडमान) में 18-20 अगस्त, 2026 तक भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र, दक्षिण अंडमान के सहयोग से एक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रशिक्षण का विषय “वैज्ञानिक शूकर पालन पद्धतियों पर जानकारी तथा जागरूकता” था और प्रशिक्षण में 25 प्रतिभागियों ने भाग लिया।

मुख्य अतिथि डॉ. वाई. रामकृष्ण, प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख, केवीके, दक्षिण अंडमान ने सत्र की अध्यक्षता की और उन्होंने लाभदायक सूकर पालन के तरीकों एवं साधनों के बारे में जानकारी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रतिभागियों को द्वीपों में सूकर पालन उद्योग की मौजूदा स्थिति और उसके सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों के साथ-साथ संभावित समाधानों से परिचित कराने के लिए एक परिचयात्मक तथा जागरूकता सत्र के साथ हुई। सत्र में शूकरों की आहार व्यवस्था, आहार अनुसूची और संतुलित आहार की अवधारणा को भी शामिल किया गया।

ICAR-CIARI and ICAR-KVK, South Andaman, jointly organises training programme on pig farming at ICAR-Krishi Vigyan Kendra, Sippighat

प्रशिक्षण में लाभदायक शूकरों पालन के लिए शूकरों के प्रजनन प्रबंधन, प्रजनन एवं आनुवंशिक चयन रणनीतियों तथा बेहतर जर्मप्लाज्म के लाभों पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। प्रतिभागियों को किसानों के लिए उपलब्ध विभिन्न वित्तीय और कल्याणकारी योजनाओं, जिसमें किसान क्रेडिट कार्ड भी शामिल है, के बारे में भी जागरूक किया गया। एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस) मॉडल के साथ सूकर पालन के एकीकरण, इसके प्रमुख घटकों और द्वीपों में इसके कार्यान्वयन की रणनीतियों पर भी चर्चा की गई।

व्यावहारिक जानकारी के एक भाग के रूप में प्रतिभागियों ने डीएएचवीएस, डॉलीगंज स्थित सूकर पालन इकाई का दौरा किया। इकाई के संचालन तथा चारा प्रबंधन, एजोला की खेती, चारा कटाई और हाइड्रोपोनिक प्रणालियों से संबंधित विभिन्न पद्धतियों का प्रदर्शन किया गया। प्रतिभागियों को नियमित प्रबंधन पद्धतियों, सूकर शावकों के लिए आयरन थेरेपी, सूकर शावकों का चयन, डॉकिंग और सुई जैसे दांतों को हटाने की प्रक्रिया से भी परिचित कराया गया।

प्रशिक्षण का समापन स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों के कुशल उपयोग और द्वीपों में चारे की कमी की समस्या से निपटने की रणनीतियों पर चर्चा के साथ हुआ। इसका उद्देश्य पशुधन पालन में लाभप्रदता और स्थिरता को बढ़ाना था।

(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान, श्री विजय पुरम)

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