21 अगस्त, 2026, मोतिहारी
भाकृअनुप–महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, ने आज अपना 12वाँ स्थापना दिवस उत्साह एवं सक्रिय भागीदारी के साथ मनाया। कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, संबंधित विभागों के अधिकारियों, कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके) के प्रमुखों, प्रगतिशील किसानों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के प्रतिनिधियों तथा अन्य हितधारकों ने भाग लिया। देश के विभिन्न हिस्सों से प्रतिभागियों ने ऑनलाइन माध्यम से भी कार्यक्रम में सहभागिता की।
डॉ. डी.सी. राय, कुलपति, बीआरएबीयू, मुजफ्फरपुर, कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उफस्थित रहे। इस अवसर पर डॉ. विकास दास, निदेशक, भाकृअनुप–राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केद्र, मुजफ्फरपुर तथा एक प्रगतिशील मत्स्य किसान सहित विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिक एवं अधिकारी भी उपस्थित रहे।
डॉ. डी. सी. राय ने भाकृअनुप–एमजीआईएफआरआई को 12वें स्थापना दिवस की बधाई देते हुए कृषि शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार और कृषक समुदायों के बीच मजबूत समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ वंदे मातरम्, भाकृअनुप गीत तथा पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। स्थापना दिवस के अवसर पर संस्थान की यात्रा को याद करते हुए केक भी काटा गया। गणमान्य अतिथियों का औपचारिक स्वागत एवं पौधे, अंगवस्त्र और स्मृति-चिह्न भेंट कर अभिनंदन किया गया। यह सम्मान पर्यावरण संरक्षण के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और प्रतिबद्धता का प्रतीक रहा।
अतिथियों का स्वागत करते हुए डॉ. राघवेंद्र सिंह, निदेशक, भाकृअनुप–एमजीआईएफआरआई ने संस्थान की प्रगति रिपोर्ट, प्रमुख अनुसंधान उपलब्धियों और भविष्य की कार्ययोजना प्रस्तुत की। उन्होंने विशेष रूप से उत्तर बिहार की विशिष्ट कृषि चुनौतियों—बाढ़, जलभराव, छोटे एवं सीमांत भू-जोत तथा संसाधनों की कमी—के अनुरूप अनुसंधान आधारित समाधान विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने बताया कि संस्थान फसल–मत्स्य–पशुधन–बागवानी आधारित समेकित कृषि प्रणालियों, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, जल एवं पोषक तत्व प्रबंधन, किसान-केन्द्रित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा क्षमता निर्माण के क्षेत्र में अनुसंधान, विकास और प्रमाणीकरण का कार्य कर रहा है।
डॉ. सिंह ने उभरती अनुसंधान प्राथमिकताओं के बारे में बताते हुए जलवायु-अनुकूल कृषि, डिजिटल एवं परिशुद्ध कृषि, कार्बन एवं पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ, कृषि-पारिस्थितिकी, सामाजिक-आर्थिक प्रभाव आकलन, प्रौद्योगिकी का विस्तार तथा क्षमता निर्माण को महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया। उन्होंने कहा कि संस्थान का उद्देश्य अनुसंधान केन्द्रों और प्रयोगशालाओं तक सीमित रहने के बजाय वैज्ञानिक उपलब्धियों को किसानों के खेतों तक ले जाकर उन्हें व्यावहारिक और आर्थिक रूप से लाभकारी समाधानों में परिवर्तित करना है।
श्री प्रफुल्ल कुमार, कमांडेंट, 71वीं बटालियन, सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) ने सीमावर्ती क्षेत्रों में एसएसबी की भूमिका और ग्रामीण समुदायों के साथ उसके जुड़ाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने सीमा क्षेत्रों में रहने वाले किसानों की आजीविका और कल्याण को मजबूत करने के लिए सहयोगात्मक पहलों के महत्व पर जोर दिया।
डॉ. विकास दास, निदेशक, भाकृअनुप–राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र, मुजफ्फरपुर, ने जटिल कृषि चुनौतियों से निपटने के लिए बहुविषयक और अंतर-संस्थागत सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कृषि प्रणालियों में बागवानी एवं फल आधारित उद्यमों को एकीकृत करने तथा कृषि आय और स्थिरता बढ़ाने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान की वास्तविक प्रासंगिकता तभी है, जब ज्ञान और प्रौद्योगिकियों को किसानों के खेतों तक पहुंचाकर उन्हें स्थानीय चुनौतियों से निपटने और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने वाले समाधानों में बदला जाए। उन्होंने युवा वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों को वास्तविक कृषि समस्याओं के समाधान के लिए किसान-केन्द्रित अनुसंधान पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित किया।

इस अवसर पर चंपारण के ऐतिहासिक महत्व को भी याद किया गया, जहाँ महात्मा गांधी के सत्याग्रह ने किसानों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिलाई थी। इसी विरासत से प्रेरणा लेते हुए संस्थान ने उत्तर बिहार के बाढ़ एवं जलभराव प्रभावित कृषि-पारिस्थितिकी तंत्र की चुनौतियों का विज्ञान आधारित हस्तक्षेपों और समेकित कृषि दृष्टिकोण के माध्यम से समाधान करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
छह महत्वपूर्ण प्रकाशनों का विमोचन: कार्यक्रम के दौरान छह महत्वपूर्ण प्रकाशनों का विमोचन किया गया। इन प्रकाशनों में संस्थान की अनुसंधान उपलब्धियों का दस्तावेजीकरण किया गया है। साथ ही, मानकीकृत प्रयोगशाला प्रक्रियाओं, जल संसाधन प्रबंधन, जलभराव वाले क्षेत्रों में आजीविका विविधीकरण, किसान–वैज्ञानिक संवाद तथा विज्ञान आधारित कृषि प्रबंधन से संबंधित ज्ञान उपलब्ध कराया गया है।
संस्थान द्वारा कृषि नवाचार, प्रौद्योगिकी अपनाने और टिकाऊ खेती में योगदान के लिए प्रगतिशील एवं नवाचारी किसानों को सम्मानित किया गया। वैज्ञानिकों, अधिकारियों, कर्मचारियों, एफपीओ प्रतिनिधियों और एसएचजी के सदस्यों को भी उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में राज्य कृषि विभाग, पशुपालन/पशुधन एवं बागवानी विभाग, पीडी-एटीएमए, बीटीएम, एटीएम तथा राष्ट्रीय बीज निगम (एनएससी) के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। इससे कृषि अनुसंधान, विस्तार सेवाओं और किसान सेवाओं में विभिन्न संस्थानों के बीच समन्वय एवं अभिसरण के महत्व को रेखांकित किया गया।
12वें स्थापना दिवस के अवसर पर भाकृअनुप–एमजीआईएफआरआई ने अपने मार्गदर्शक दृष्टिकोण “अनुसंधान से समाधान, किसानों से समृद्धि और समेकित कृषि से जीवंत ग्रामीण अर्थव्यवस्था” के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। संस्थान ने बाढ़ और जलभराव से प्रभावित कृषि-पारिस्थितिकी तंत्र के लिए वैज्ञानिक, टिकाऊ और किसान-केंद्रित समाधान विकसित करने पर निरंतर ध्यान केंद्रित करने का संकल्प व्यक्त किया।
डॉ. एस.के. पुरबे, आयोजन सचिव ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, वैज्ञानिकों, अधिकारियों, कर्मचारियों, किसानों और सभी हितधारकों की सहभागिता एवं सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गान और सामूहिक फोटोग्राफ के साथ हुआ।
(स्रोत: भाकृअनुप–महत्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार)







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