भाकृअनुप-एनआरआईआईपीएम, नई दिल्ली द्वारा “अफ्रीकी विशाल घोंघा के समेकित प्रबंधन” पर किसान-वैज्ञानिक संवाद एवं आदान वितरण कार्यक्रम का आयोजन

भाकृअनुप-एनआरआईआईपीएम, नई दिल्ली द्वारा “अफ्रीकी विशाल घोंघा के समेकित प्रबंधन” पर किसान-वैज्ञानिक संवाद एवं आदान वितरण कार्यक्रम का आयोजन

18 जुलाई, 2026, नई दिल्ली

भाकृअनुप–राष्ट्रीय समेकित कीट प्रबंधन अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-एनआरआईआईपीएम), नई दिल्ली, के प्रायोजन तथा विद्या भवन कृषि विज्ञान केन्द्र, उदयपुर द्वारा राजस्थान के उदयपुर जिले के फलासिया क्षेत्र के बिछीवाड़ा गाँव में “अफ्रीकी विशाल घोंघा के समेकित प्रबंधन” विषय पर किसान-वैज्ञानिक संवाद एवं आदान वितरण कार्यक्रम का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं तथा किसानों ने भाग लिया और अफ्रीकी विशाल घोंघे की बढ़ती समस्या पर चर्चा की, जिसने पिछले तीन वर्षों से बिछीवाड़ा गाँव की कृषि के सामने एक गंभीर चुनौती उत्पन्न कर दी है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, राजस्थान सरकार के जनजातीय क्षेत्र विकास एवं होमगार्ड विभाग के कैबिनेट मंत्री श्री बाबूलाल खराड़ी ने किसानों को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने तथा कृषि विस्तार सेवाओं से जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहित किया।

ICAR-NRIIPM, New Delhi Organises Farmer-scientist interaction and input distribution programme on “Integrated Management of African Giant Snails”

विशेषज्ञों ने घोंघा प्रकोप की समस्या पर विस्तार से जानकारी दी, जबकि मुख्य वैज्ञानिक व्याख्यान में घोंघे की जीवविज्ञान, उसकी क्षति पहुँचाने की क्षमता तथा उसके नियंत्रण के लिए समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) रणनीतियों पर प्रकाश डाला गया। इसमें यांत्रिक, जैविक तथा रासायनिक नियंत्रण उपायों पर विशेष बल दिया गया। उन्होंने बताया कि अफ्रीकी विशाल घोंघा अत्यधिक बहुभक्षी (Polyphagous) है और मक्का, सब्जियों, दलहनी फसलों तथा फल फसलों को गंभीर क्षति पहुँचाता है। आईयूसीएन ने इसे विश्व की 100 सबसे खतरनाक आक्रामक प्रजातियों में शामिल किया है। किसानों को सलाह दी गई कि वे सुबह और शाम दस्ताने पहनकर हाथ से घोंघों को एकत्र करें, मिट्टी से अंडों को निकालकर नष्ट करें तथा घोंघों को मारने के लिए उन्हें नमक या चूने के घोल में डुबो दें।

घोंघों को आकर्षित कर नष्ट करने के लिए खेत में यीस्ट मिश्रित पानी अथवा गुड़-यीस्ट घोल रखने की सलाह दी गई। बत्तखों का उपयोग करने तथा पक्षियों एवं मेंढकों जैसे प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण पर भी बल दिया गया। नियंत्रण हेतु मेटाल्डिहाइड (2.5% अथवा 5% ग्रेन्यूल), आयरन फॉस्फेट, कॉपर सल्फेट, नमक तथा चूने के उपयोग की जानकारी दी गई। साथ ही रसायनों को बच्चों और पशुधन से दूर रखने, वर्षा से पूर्व उनका उपयोग न करने तथा केवल पंजीकृत उत्पादों का ही प्रयोग करने जैसी विशेष सावधानियों पर भी जोर दिया गया। घोंघे का जीवन चक्र चार अवस्थाओं—अंडा, किशोर (जुवेनाइल), उप-वयस्क (सब-एडल्ट) और वयस्क—से मिलकर बना होता है। अनुकूल परिस्थितियों में यह तेजी से प्रजनन करता है तथा 3–5 वर्षों तक जीवित रह सकता है। इसके प्रकोप के सामान्य लक्षणों में पत्तियों में छेद, नई कोपलों का नष्ट होना, फलों पर खुरचने के निशान तथा खेत में चिपचिपे बलगम जैसी लकीरों (Slime Trails) की उपस्थिति शामिल है।

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कार्यक्रम के दौरान “अफ्रीकी घोंघों का प्रबंधन” विषय पर एक वैज्ञानिक फोल्डर का विमोचन किया गया तथा किसानों को आवश्यक आदान सामग्री के रूप में मेटाल्डिहाइड (340 किलोग्राम), चूना (3200 किलोग्राम) तथा नमक (1000 किलोग्राम) वितरित किया गया। कार्यक्रम में 250 से अधिक किसानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और व्यावहारिक प्रदर्शनों तथा विशेषज्ञ मार्गदर्शन से लाभान्वित हुए।

सभी गणमान्य व्यक्तियों ने डॉ. एम.एल. जाट, सचिव, डेयर एवं महानिदेशक, भाकृअनुप; डॉ. पूनम जसरोतिया, एडीजी (पीपी एवं बी), भाकृअनुप; तथा डॉ. आर. थंगावेलु, निदेशक, भाकृअनुप-एनआरआईआईपीएम, नई दिल्ली के प्रति आभार व्यक्त किया, जिन्होंने घोंघा प्रबंधन परियोजना के लिए 6.25 लाख रुपये की वित्तीय सहायता एवं प्रशिक्षण सहयोग उपलब्ध कराया। इस अवसर पर मंत्री श्री बाबूलाल खराड़ी ने भी घोंघा प्रबंधन परियोजना के लिए अपनी निधि से 5 लाख रुपये के योगदान की घोषणा की।

(स्रोत: भाकृअनुप–राष्ट्रीय समेकित कीट प्रबंधन अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली)

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