भारत का मूल निवासी और सबसे लचीले लेकिन कम इस्तेमाल होने वाले छोटे बाजरा में से एक, लिटिल मिलेट लंबे समय से सीमांत और कम इनपुट वाले वातावरण में खेती करने वाले किसान समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण भोजन और पोषण संसाधन रहा है। सूखे, खारेपन और जलजमाव की स्थिति में भी पनपने की अपनी उल्लेखनीय क्षमता, और इसमें प्राकृतिक रूप से उच्च आयरन एवं डाइटरी फाइबर सामग्री के बावजूद, यह फसल ऐतिहासिक रूप से मुख्यधारा के फसल सुधार कार्यक्रमों में उपेक्षित रही है। हाल के वर्षों में एक पौष्टिक ग्लूटेन-फ्री अनाज और एक क्लाइमेट-स्मार्ट खाद्य सामग्री के रूप में इसकी बढ़ती प्रमुखता ने इसके सुधार और वैश्विक उपयोग में तेजी लाने के लिए उन्नत जीनोमिक संसाधनों की तत्काल आवश्यकता पैदा की है।
इस आवश्यकता का जवाब देते हुए, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप) ने लिटिल मिलेट (Panicum sumatrense) के पहले क्रोमोसोम-स्केल संदर्भ जीनोम को डीकोड करके तथा जारी करके एक ऐतिहासिक वैज्ञानिक सफलता हासिल की है। यह अग्रणी कार्य, भाकृअनुप-भारतीय श्री अन्न अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद, में ग्लोबल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन मिलेट्स (श्री अन्न) द्वारा, यूनिवर्सिटी ऑफ सस्केचेवान, कनाडा, नेशनल रिसर्च काउंसिल इन सस्केचेवान, कनाडा, और यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज, जीकेवीके-बेंगलुरु के सहयोग से किया गया है, और इसे नेचर कम्युनिकेशंस (https://doi.org/10.1038/s41467-025-66716-6) में प्रकाशित किया गया है। यह उपलब्धि बाजरा जीनोमिक्स में भारत के नेतृत्व के लिए एक प्रमुख मील का पत्थर है और क्लाइमेट-रेजिलिएंट फसलों पर अनुसंधान को आगे बढ़ाने के वैश्विक प्रयासों को मजबूत करती है।

एक हाइब्रिड सीक्वेंसिंग रणनीति का उपयोग करते हुए जिसमें लॉन्ग-रीड और शॉर्ट-रीड तकनीकों को मिलाया गया था, शोधकर्ताओं ने जीनोटाइप JK-8 के लिए एक अत्यधिक पूर्ण जीनोम असेंबली विकसित की। अंतिम असेंबली 18 क्रोमोसोम तक फैली हुई है और इसमें 59,000 एनोटेटेड प्रोटीन-कोडिंग जीन शामिल हैं जो प्रमुख फसल विशेषताओं के लिए जिम्मेदार हैं, जिनमें चुनौतीपूर्ण जलवायु के प्रति लचीलापन, पोषण संबंधी गुण और अनाज की विशेषताएं शामिल हैं। विशेष रूप से, सात क्रोमोसोम को टेलोमेयर से टेलोमेयर तक इकट्ठा किया गया था, जो असाधारण निरंतरता और सटीकता को दर्शाता है। टीम ने पूरे भारत से प्राप्त 300 लिटिल मिलेट किस्मों का भी विश्लेषण किया, जिसमें लगभग 250,000 SNP जेनेटिक मार्कर की पहचान की गई। ये मार्कर इस बात की बहुमूल्य जानकारी देते हैं कि उपज और पोषक तत्व सामग्री जैसे लक्षण किस्मों के बीच कैसे भिन्न होते हैं। यह एकीकृत जीनोमिक और फेनोटाइपिक डेटासेट किसी भी छोटे बाजरा प्रजाति के लिए विकसित किए गए सबसे व्यापक संसाधनों में से एक का प्रतिनिधित्व करता है।
इन खोजों से ब्रीडर्स के लिए महत्वपूर्ण मॉलिक्यूलर टारगेट मिलते हैं और मॉलिक्यूलर ब्रीडिंग, मार्कर-असिस्टेड सिलेक्शन, जीनोमिक सिलेक्शन और टारगेटेड जीन-एडिटिंग तरीकों का इस्तेमाल करके बेहतर किस्मों के विकास का रास्ता खुलता है। इस सफलता के वैश्विक खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मायने हैं। लिटिल मिलेट को तेजी से एक जलवायु-अनुकूल फसल के रूप में पहचाना जा रहा है जो खराब मिट्टी, उच्च तनाव वाले वातावरण एवं जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में भी उगने में सक्षम है। इसमें आयरन की असाधारण मात्रा इसे ग्रामीण तथा शहरी दोनों आबादी में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी से लड़ने के लिए एक आशाजनक उम्मीदवार बनाती है। रेफरेंस जीनोम और बड़े पैमाने पर मॉलिक्यूलर डेटासेट की उपलब्धता के साथ, अब इस फसल को उपज स्थिरता, पोषण संवर्धन, तनाव अनुकूलन एवं आधुनिक खाद्य उत्पाद विकास के लिए उपयुक्तता के लिए व्यवस्थित रूप से बेहतर बनाया जा सकता है।
यह ध्यान देने योग्य है कि यह सफलता ग्लोबल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन मिलेट्स (श्री अन्न) में हासिल की गई, जिसे मार्च 2023 में प्रधानमंत्री द्वारा औपचारिक रूप से राष्ट्र को समर्पित किया गया था। श्री अन्न अनुसंधान को आगे बढ़ाने, किस्मों में सुधार में तेजी लाने, श्री अन्न की खेती को बढ़ावा देने तथा वैश्विक साझेदारी को बढ़ावा देने के स्पष्ट जनादेश के साथ स्थापित, यह केन्द्र कम शोध वाली फसलों में वैज्ञानिक नवाचार का विस्तार करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। लिटिल मिलेट जीनोम की डिकोडिंग इस विजन को दर्शाती है और अंतर्राष्ट्रीय श्री अन्न वर्ष के बाद के युग में भारत के नेतृत्व को मजबूत करती है। इस उपलब्धि के साथ, भाकृनुप अब अगली पीढ़ी की ब्रीडिंग को आगे बढ़ाने, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को गहरा करने के साथ-साथ दुनिया भर के किसानों और उपभोक्ताओं के लिए पोषक तत्वों से भरपूर, जलवायु-स्मार्ट लिटिल मिलेट किस्मों को तेजी से विकसित करने के लिए अच्छी स्थिति में है।
(स्रोत: भाकृअनुप-भारतीय श्री अन्न अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद)







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