भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा के वैज्ञानिको द्वारा 5 फसलों की नयी 8 उन्नतशील किस्में विकसित करने में सफलता प्राप्त की है। विकसित किस्मों में मक्का की वी एल हिमाद्री (एफ एच 3879), जौ की वी0एल0बी0 177, मसूर की वी0एल0 मसूर 538 तथा वी0एल0 मसूर 535, सोयाबीन की वी0एल0 सोया 106 तथा वी0एल0 सोया 107 तथा धान की वी. एल. धान 71 व वीएल धान 160 शामिल है। राज्य किस्म विमोचन समिति की बैठक दिनांक 10-09-2026 में इसे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जैविक वर्षा आश्रित परिस्थितियों में समय पर बुवाई के लिए विमोचित किया गया।
वी एल हिमाद्री (एफ एच 3879)
इस संकर मक्का प्रजाति का विकास वी 495 व वी 461 के संयोजन से किया गया है। यह सामान्य मक्का की एक अगेती प्रजाति है (90-95 दिन परिपक्वता)। राज्य-स्तरीय परीक्षणों में इसकी औसत उपज 4,864 किग्रा/हैक्टर थी जो चैक प्रजाति वीएमएच 45 से 15.21 प्रतिशत अधिक थी। इस प्रजाति ने टर्सिकम व मेडिस पर्ण झुलसा के लिए मध्यम प्रतिरोधकता भी प्रदर्शित की। वी एल हिमाद्री की उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में जैविक वर्षा आश्र्रित परिस्थितियों में समय पर बुवाई हेतु विमोचन के लिये संस्तुति की गयी है।

वीएलबी 177
यह जौ की एक नई उच्च उपज देने वाली द्वि-उद्देशीय किस्म है, जिसे भाकृअनुप-विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा चयन पद्धति द्वारा विकसित किया गया है। तीन वर्षों के उत्तराखंड राज्य परीक्षणों में वीएलबी 177 ने 1,730 किग्रा/हैक्टर औसत दाना उपज दी, जो चेक किस्मों वीएलबी 118, वीएलबी 130 एवं यूपीबी 1008 की तुलना में क्रमशः 7.5, 10.3 एवं 23.9 प्रतिशत अधिक थी। उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों के द्वि-उद्देशीय परीक्षणों में वीएलबी 177 में 70-75 दिनों पर चारा कटाई के उपरांत 27.7 क्विंटल @g-s दाना तथा 107.7 क्विंटल @gs- हरे चारे की उपज देने की क्षमता पाई गई। यह किस्म पीला एवं भूरा रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोधी पाई गई। राज्य किस्म विमोचन समिति की बैठक दिनांक 10.09.2026 में इसे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की समय पर बोई गई जैविक वर्षा आधारित परिस्थितियों के लिए विमोचित किया गया।

वी0एल0 मसूर 538 (बड़े दाने वाली)
वी0एल0 मसूर 538 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में समय पर बोई जाने वाली वर्षा आधारित एवं जैविक खेती की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित बड़ी दाना वाली मसूर की उन्नत किस्म है। इसकी औसत उपज क्षमता 1,150 किग्रा/हैक्टर है तथा यह 155-160 दिनों में परिपक्व होती है। पोषण की दृष्टि से यह किस्म श्रेष्ठ है, जिसके बीज में 23.47 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। राज्य स्तरीय परीक्षणों (SVT) में तीन वर्षों के दौरान वी0एल0 मसूर 538 ने उकठा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधी प्रतिक्रिया प्रदर्शित की। यह किस्म उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के वर्षा आधारित एवं जैविक उत्पादन के लिए उपयुक्त होने के साथ-साथ उच्च पोषण गुणवत्ता वाली मसूर के रूप में किसानों के लिए उपयोगी विकल्प है।

वी0एल0 मसूर 535 (बड़े दाने वाली)
वी0एल0 मसूर 535 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में समय पर बोई जाने वाली वर्षा आधारित एवं जैविक खेती की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित बड़ी दाना वाली मसूर की उन्नत किस्म है। इसकी औसत उपज क्षमता 1,202 किग्रा/हैक्टर है तथा यह 155-160 दिनों में परिपक्व होती है। पोषण की दृष्टि से यह किस्म श्रेष्ठ है, जिसके बीज में 24.91 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। राज्य स्तरीय परीक्षणों (एसवीटी) में तीन वर्षों के परीक्षण के दौरान वी0एल0 मसूर 535 ने उकठा रोग के प्रति प्रतिरोधी प्रतिक्रिया प्रदर्शित की। यह किस्म उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की वर्षा आधारित एवं जैविक खेती के लिए उपयुक्त होने के साथ-साथ उच्च उपज, बेहतर पोषण गुणवत्ता और रोग प्रतिरोधकता के कारण किसानों के लिए एक उपयोगी विकल्प है।

वी0एल0 सोया 106
वी0एल0 सोया 106 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की वर्षा आधारित एवं जैविक खेती की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित सोयाबीन की उन्नत किस्म है। इसका पेडिग्री VLS 75/VLS 59 है और इसकी औसत उपज 1,649 किग्रा/हैक्टर है। यह किस्म 115-120 दिनों में परिपक्व होती है तथा पौधों की औसत ऊंचाई 80-85 सेमी रहती है। इसके 100 बीजों का वजन 14.50 ग्राम है। खेत परिस्थितियों में परीक्षण के दौरान वी0एल0 सोया 106 ने FLS के प्रति प्रतिरोधता प्रदर्शितकी है। यह किस्म उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त होने के साथ-साथ अच्छी उपज, उचित परिपक्वता अवधि और रोग प्रतिरोधकता के कारण किसानों के लिए उपयोगी विकल्प है।
वी0एल0 सोया 107
वी0एल0 सोया 107 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की वर्षा आधारित एवं जैविक खेती की परिस्थितियों के लिए अनुकूलित सोयाबीन की उन्नत किस्म है। इसका पेडिग्री VLS 63/Himso 1685 है और इसकी औसत उपज 1700-1800 किग्रा/हैक्टर है। यह किस्म 115-120 दिनों में परिपक्व होती है तथा पौधों की औसत ऊंचाई 70-75 सेमी रहती है। इसके 100 बीजों का वजन 14.95 ग्राम है। खेत परिस्थितियों में परीक्षण के दौरान वी0एल0 सोया 107 ने FLS रोग के प्रति प्रतिरोधी प्रतिक्रिया प्रदर्शित की है। यह किस्म उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त होने के साथ-साथ अच्छी उपज, उचित परिपक्वता अवधि और रोग प्रतिरोधकता के कारण किसानों के लिए उपयोगी विकल्प है।

वी. एल. धान 71 (वी एल 32471,आईईटी 28213)
इस किस्म को उत्तराखंड की पर्वतीय क्षेत्रों और घाटियों की सिंचित रोपाई जैविक परिस्थितियों के लिए जारी किया गया है यह एक लंबी पतली (छिलका रहित दाने की लंबाई 7.32 मिमी और लंबाई/चैड़ाई अनुपात 3.53) धान की प्रजाति है जिसे भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा में खजीया धान/वी एल 30424 से विकसित किया गया है। यह प्रजाति प्रमुख बीमारियों जैसे पत्ती एवं बाली झौंका (स्कोर 1-3), भूरी चित्ती (स्कोर 3-4), और दानों का बदरंगपन (स्कोर 0-1) के लिए प्रतिरोधी है और तनाबेधक एवं पत्ती लपेटक (स्कोर 0-3) के लिए भी प्रतिरोधी पाई जाती है। इसमें बहुत अच्छी गुणवत्ता वाले लक्षण जैसे 78 प्रतिशत छिलका उतारने की प्रतिशतता, 69 प्रतिशत कुटाई/प्रसंस्करण की प्रतिशतता, 54 प्रतिशत साबुत चावल की प्राप्ति, 21.06 प्रतिशत की मध्यवर्ती एमाइलोज सामग्री हैं। इसके पौधे की ऊंचाई 80-85सेमी और पकने की अवधि 125-130 दिन है। एसवीटी में जैविक परिस्थितियों में तीन वर्षों के परीक्षण के दौरान, इस किस्म की औसत उपज 3,609 किलोग्राम/हेक्टेयर है और इसने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सर्वोत्तम चेक पंत धान 26 से 21.50 प्रतिशत तथा विवेक धान 62 की तुलना में 22.30 प्रतिशत का महत्वपूर्ण उपज लाभ दिखाया है। यह किस्म किसानों और बीज उत्पादकों द्वारा पर्वतीय इलाकों में लंबे समय से चली आर ही धान की बौनी पौधों वाली प्रजाति की मांग को पूरा करेगी।

वीएल धान 160 (वीएल 20986, आईईटी 30525)
यह प्रजाति वर्षाश्रित उपराऊ जेठी धान में जैविक परिस्थितियों में बोई जाने हेतु विमोचित की गयी। जैविक परिस्थितियों में इस प्रजाति की औसत उपज 2,321 किलोग्राम/हेक्टेयर देखी गई है जो कि मानक प्रजाति विवेक धान 154 की तुलना में 18.37 प्रतिशत तथा वी एल धान 156 की तुलना में 10.78 प्रतिशत अधिक है। इस किस्म को वीएल 7620/वीएल 8801 के संकरण से विकसित किया गया है इसके पौधे की ऊंचाई 90-95 सेमी तथा प्राकृतिक स्थिति में पत्ती एवं बाली झौंका (स्कोर 1-3), भूरी चित्ती (स्कोर 3-4), पर्णच्छद विगलन (स्कोर 1), पर्णच्छद अंगमारी (स्कोर 3) आभासी कण्ड (स्कोर 0-1) पत्ती लपेटक और तनाबेधक (स्कोर 0-3) के खिलाफ प्रतिरोधी पाया गया है। इस प्रजाति के पौधे की ऊंचाई मध्यवर्ती, पौधे अर्ध-खड़ी और नहीं गिरने वाले होते हैं। इसने बेहतर गुणवत्ता वाली विशेषताओं का भी प्रदर्शन किया जैसे कि उच्च छिलका उतारने की प्रतिशतता (82 प्रतिशत), कुटाई/प्रसंस्करण की प्रतिशतता (74 प्रतिशत), साबुत चावल की प्राप्ति (58 प्रतिशत) और एमाइलोज (21.60 प्रतिशत)। इसके दाने लंबे मोटे है।

(भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा)








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