25 मई, 2026, बलागढ़
नाव पर आयोजित एक अनूठी जनजागरूकता पहल के अंतर्गत, भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई), बैरकपुर ने पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के बलागढ़ ब्लॉक के मत्स्य किसानों के लिए मेरा गांव मेरा गौरव कार्यक्रम के तहत उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर एक जागरूकता अभियान आयोजित किया। ‘सतत मत्स्य पालन हेतु मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा’ विषयक इस अभियान में मृदा स्वास्थ्य, पोषक तत्व प्रबंधन तथा सतत जलीय कृषि के बीच महत्वपूर्ण संबंधों को रेखांकित किया गया।
यह समझते हुए कि अनेक मछुआरे किसान भी हैं, कार्यक्रम का उद्देश्य जलीय कृषि प्रणालियों में उर्वरकों के वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना था, ताकि उत्पादकता में वृद्धि हो, पारिस्थितिक संतुलन बना रहे तथा अंतर्देशीय मत्स्य पालन की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित हो सके। नाव आधारित इस नवाचारी प्रारूप ने मत्स्य समुदाय के साथ उनके कार्यस्थल परिवेश में प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करने का अवसर प्रदान किया।
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, भाकृअनुप–सीआईएफआरआई, ने कृषि जलग्रहण क्षेत्रों में उर्वरकों के असंतुलित उपयोग के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा कि इससे मृदा क्षरण तथा पोषक तत्वों का बहाव तेज होता है, जो जलीय पारितंत्रों और मछलियों के स्वास्थ्य के लिए खतरा उत्पन्न करता है। उन्होंने मृदा एवं जल परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग की जोरदार वकालत की तथा किसानों से जैव उर्वरकों, जैविक आदानों एवं सटीक पोषक तत्व प्रबंधन दृष्टिकोणों को शामिल करते हुए समेकित पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों को अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने बल दिया कि संतुलित उर्वरीकरण केवल अधिक मत्स्य उत्पादकता के लिए ही नहीं, बल्कि जल गुणवत्ता और पारितंत्र की सहनशीलता बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है।
विशेषज्ञों ने मृदा स्वास्थ्य और जलीय पारितंत्र स्वास्थ्य के पारस्परिक संबंधों पर एक ज्ञानवर्धक सत्र प्रस्तुत किया तथा सतत मत्स्य विकास में इनके महत्व को रेखांकित किया।
विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की टीम द्वारा संचालित इस कार्यक्रम का मुख्य फोकस समेकित पोषक तत्व प्रबंधन और मृदा स्वास्थ्य संरक्षण था। तकनीकी सत्रों के दौरान वैज्ञानिकों ने बताया कि कृषि में रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग अक्सर विषैले बहाव के रूप में तालाबों और आर्द्रभूमियों तक पहुँचता है, जिससे जलीय जैव विविधता और मछलियों के अस्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
प्रतिभागियों को आवश्यकता आधारित उर्वरक उपयोग, तालाब की तली की मिट्टी का समय-समय पर परीक्षण तथा संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों के बारे में जागरूक किया गया, जिनका उद्देश्य पर्यावरणीय गुणवत्ता से समझौता किए बिना जलीय कृषि उत्पादकता को बढ़ाना है।
कार्यक्रम में कुल 35 मत्स्य किसानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया, जिनमें 25 महिला प्रतिभागी शामिल थीं। यह सामुदायिक सहभागिता की मजबूत भावना तथा मत्स्य आधारित आजीविकाओं में महिलाओं की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
पश्चिम बंगाल में मत्स्य पालन ग्रामीण आजीविका का एक महत्वपूर्ण आधार होने के कारण, यह पहल उर्वरकों के दक्ष उपयोग, पर्यावरणीय जोखिमों में कमी, तालाब उत्पादकता में वृद्धि तथा जलवायु-सहिष्णु जलीय कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूकता को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देगी। इससे आजीविका सुरक्षा और पारिस्थितिक स्थिरता को बढ़ावा मिलने की अपेक्षा है।
(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)







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