भाकृअनुप‑वीपीकेएएस, अल्मोड़ा द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत विभिन्‍न गांवों में जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

भाकृअनुप‑वीपीकेएएस, अल्मोड़ा द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत विभिन्‍न गांवों में जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

3 जून, 2026, अल्मोड़ा

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 1 से 30 जून, 2026 तक संचालित राष्ट्रव्यापी प्रमुख कार्यक्रम “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत भाकृअनुप‑विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (वीपीकेएएस), अल्मोड़ा के वैज्ञानिकों द्वारा दिनांक 3 जून, 2026 को जनपद अल्मोड़ा के विभिन्न गांवों में कृषक जागरूकता कार्यक्रम तथा कृषक गोष्ठियों का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम संस्‍थान के निदेशक डॉ. लक्ष्‍मी कान्‍त के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया साथ ही इस आयोजन में विकासखंड हवालबाग के ग्राम हवालबाग, रेलाकोट, नौगांव, खूँट एवं चाण सहित विकासखंड ताकुला के ग्राम लोद को शामिल किया गया।

   

कार्यक्रमों के दौरान किसानों को संतुलित एवं वैज्ञानिक उर्वरक उपयोग, मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, फसल विविधीकरण तथा दलहनी एवं तिलहनी फसलों के प्रोत्साहन के बारे में विस्तार से जानकारी प्रदान की गई। वैज्ञानिकों ने रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मृदा स्वास्थ्य, फसल उत्पादकता एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा करते हुए किसानों को मृदा परीक्षण कराकर आवश्यकता‑आधारित एवं संतुलित उर्वरक प्रयोग हेतु प्रेरित किया।

किसानों को हरित खाद, जैविक खाद, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, जीवामृत, घन‑जीवामृत, जैव उर्वरकों तथा फसल अवशेषों के समुचित उपयोग से मृदा उर्वरता बनाए रखने के उपायों की जानकारी दी गई और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने पर बल दिया गया। प्राकृतिक तथा जैविक खेती के साथ-साथ कम लागत वाली ‘प्राकृतिक खेती’ की अवधारणा, लाभ तथा व्यावहारिक पहलुओं पर भी विस्तृत चर्चा की गई।

   

मक्का एवं छोटे अनाजों की फसल प्रबंधन तकनीकों, विशेषकर फॉल आर्मीवर्म जैसे कीटों की सांस्कृतिक एवं जैविक विधियों से रोकथाम पर किसानों को व्यावहारिक जानकारी दी गई। साथ ही मृदा एवं जल संरक्षण, मृदा अपरदन को कम करने, भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ाने तथा पर्वतीय कृषि भूमि की उत्पादकता बनाए रखने वाली तकनीकों पर भी जोर दिया गया।

एक विशेष कार्यक्रम के दौरान दलहन एवं तिलहन विकास योजनाओं के अंतर्गत उपलब्ध सुविधाओं, उन्नत किस्मों, गुणवत्तापूर्ण बीज, अनुशंसित उत्पादन प्रौद्योगिकियों एवं सरकारी सहायता के बारे में भी किसानों को अवगत कराया गया साथ ही फसल प्रणाली में दलहन एवं तिलहन फसलों को शामिल कर पोषण सुरक्षा तथा मृदा उर्वरता सुधारने पर बल दिया गया।

   

संवाद सत्रों में किसानों ने बंदर एवं जंगली सूअर द्वारा फसलों को होने वाली क्षति तथा सोयाबीन, भट, कुल्थी आदि की उन्नत किस्मों के बीज उपलब्धता से जुड़े प्रश्न उठाए, जिनका वैज्ञानिकों द्वारा समाधान किया गया। ग्राम लोद में आयोजित कृषक गोष्ठी में किसानों को स्थानीय संसाधनों पर आधारित जैविक खेती, गोबर की खाद को खुले में न छोड़ने, फसल अवशेषों को जलाने के बजाय कम्पोस्ट तैयार करने, तथा दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करने के लिए प्रेरित किया गया। रेलाकोट एवं अन्य ग्रामों में आयोजित कार्यक्रमों में ग्राम प्रधान एवं कृषि विभाग के स्थानीय अधिकारियों की उपस्थिति ने किसानों को मृदा संरक्षण एवं सतत कृषि पद्धतियाँ अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।

इन सभी कार्यक्रमों का समन्वय भाकृअनुप‑विवेकानन्‍द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्‍थान, अल्मोड़ा के वैज्ञानिकों की विभिन्न टीमों ने किया।

लगभग 143 कृषकों ने उत्साहपूर्वक खेत बचाओ अभियान में शिरकत की, जिनमें बड़ी संख्या में महिला कृषक भी शामिल रहीं।

(स्रोतः भाकृअनुप‑विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा)

×