भाकृअनुप-सीटीसीआरआई, तिरुवनंतपुरम द्वारा ‘सतत फसल उत्पादन हेतु मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन एवं उर्वरकों के संतुलित उपयोग’ पर कार्यशाला का आयोजन

भाकृअनुप-सीटीसीआरआई, तिरुवनंतपुरम द्वारा ‘सतत फसल उत्पादन हेतु मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन एवं उर्वरकों के संतुलित उपयोग’ पर कार्यशाला का आयोजन

26 मई, 2026, तिरुवनंतपुरम

भाकृअनुप-केन्द्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान (सीटीसीआरआई), तिरुवनंतपुरम, में आज आयोजित ‘सतत फसल उत्पादन हेतु मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन एवं उर्वरकों के संतुलित उपयोग’ विषयक कार्यशाला में सतत कृषि उत्पादन तथा पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करने में मृदा स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण महत्व को रेखांकित किया गया। इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं, प्रसार विशेषज्ञों तथा किसानों ने भाग लिया और केरल की प्रमुख फसलों में मृदा उर्वरता बनाए रखने, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन तथा फसल उत्पादकता में सुधार के लिए नवाचारपूर्ण रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया।

कार्यशाला में समेकित मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन पद्धतियों तथा उर्वरकों के संतुलित उपयोग की भूमिका पर बल दिया गया, जो कृषि निवेश लागत को कम करने, पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने तथा जलवायु-सहिष्णु कृषि को प्रोत्साहित करने में सहायक हैं।

ICAR-CTCRI, Thiruvananthapuram Organizes Workshop on ‘Soil Health Management and Balanced Fertilizer Use for Sustainable Crop Production’

मुख्य अतिथि डॉ. पी. राजेन्द्रन, अध्यक्ष, किसान कल्याण निधि बोर्ड, केरल सरकार तथा पूर्व कुलपति, केरल कृषि विश्वविद्यालय ने कहा कि उर्वरकों के संतुलित उपयोग के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य बनाए रखना सतत कृषि उत्पादकता, पर्यावरण संरक्षण तथा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। डॉ. राजेन्द्रन ने केरल में जलवायु-सहिष्णु एवं लाभकारी कृषि प्रणालियों को विकसित करने के लिए वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों को किसानों के पारंपरिक ज्ञान के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. जी. बिजू, निदेशक, भाकृअनुप-सीटीसीआरआई, ने अध्यक्षीय संबोधन दिया तथा पादप पोषण एवं खाद्य सुरक्षा पर तकनीकी जानकारी प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि स्वस्थ मृदा तथा संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन सतत कृषि एवं खाद्य सुरक्षा की आधारशिला हैं। उन्होंने फसल उत्पादकता बढ़ाने, मृदा उर्वरता बनाए रखने तथा केरल में जलवायु-सहिष्णु कृषि प्रणालियों को समर्थन देने के लिए पर्यावरण-अनुकूल एवं वैज्ञानिक रूप से संतुलित उर्वरक उपयोग पद्धतियों को अपनाने के महत्व पर बल दिया। कार्यक्रम में लगभग एक सौ अस्सी प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

तकनीकी सत्रों में पादप पोषण एवं खाद्य सुरक्षा, उर्वरकों का संतुलित उपयोग, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, सतत उपज के मार्ग तथा अम्लीय मृदाओं में फसल उत्पादन जैसे विविध विषयों को शामिल किया गया। केरल कृषि विश्वविद्यालय, भाकृअनुप-केन्द्रीय बागान फसल अनुसंधान संस्थान, कासरगोड तथा भाकृअनुप-केन्द्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान, तिरुवनंतपुरम के विशेषज्ञों ने विशेष रूप से अम्लीय मृदाओं में बागान फसलों एवं उष्णकटिबंधीय कंद फसलों के पोषक तत्व प्रबंधन संबंधी वैज्ञानिक प्रगति और व्यावहारिक सिफारिशों को साझा किया।

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कार्यशाला में पलक्कड़ जिले के किसानों के साथ एक संवादात्मक सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें केरल की परिस्थितियों के अनुकूल सतत फसल उत्पादन प्रौद्योगिकियों तथा कृषि तकनीकों पर चर्चा की गई। यह कार्यक्रम शोधकर्ताओं, प्रसार कार्मिकों तथा कृषक समुदायों के बीच ज्ञान आदान-प्रदान के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ, जिसने दीर्घकालिक कृषि स्थिरता, खाद्य सुरक्षा तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए उर्वरकों के संतुलित उपयोग और मृदा संरक्षण की आवश्यकता को पुनः सुदृढ़ किया।

डॉ. बिजू तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने कार्यशाला के तकनीकी सत्र में विभिन्न विषयों पर प्रस्तुति दी।

कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं, प्रसार विशेषज्ञों तथा किसानों सहित लगभग 180 प्रतिभागियों ने भाग लिया।

(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान, तिरुवनंतपुरम)

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