भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में भारत के मीठे जल पारितंत्रों के लिए खतरा बन रही आक्रामक विदेशी मछलियों के विरुद्ध त्वरित राष्ट्रीय कार्रवाई का आह्वान

भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में भारत के मीठे जल पारितंत्रों के लिए खतरा बन रही आक्रामक विदेशी मछलियों के विरुद्ध त्वरित राष्ट्रीय कार्रवाई का आह्वान

21–22 मई, 2026, बैरकपुर

भारत की मीठे जल की जैव विविधता, मत्स्य संसाधनों तथा आजीविकाओं पर आक्रामक विदेशी मछलियों द्वारा उत्पन्न बढ़ते खतरे को देखते हुए, भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई), बैरकपुर द्वारा “मीठे जल पारितंत्रों में आक्रामक विदेशी मछलियाँ: वर्तमान स्थिति, ज्ञान अंतराल एवं भविष्य की अनुसंधान प्राथमिकताएँ” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में नाइल तिलापिया, कॉमन कार्प, सकरमाउथ आर्मर्ड कैटफिश तथा अफ्रीकी कैटफिश जैसी आक्रामक मछली प्रजातियों के बढ़ते प्रसार से उत्पन्न पारिस्थितिक एवं आर्थिक चिंताओं पर चर्चा की गई। ये प्रजातियाँ देश के अनेक अंतर्देशीय जल निकायों में स्थापित हो चुकी हैं, जिससे जैव विविधता का क्षरण, आवासों में व्यवधान, पारिस्थितिक असंतुलन तथा मत्स्य आधारित आजीविकाओं पर खतरा उत्पन्न हो रहा है।

कार्यशाला का उद्घाटन पश्चिम बंगाल यूनिवर्सिटी ऑफ एनिमल एंड फिशरी साइंसेज, कोलकाता के कुलपति डॉ. टी. के. दत्ता द्वारा किया गया। उन्होंने भारत की देशी जलीय जैव विविधता की सुरक्षा के लिए संस्थानों के बीच सहयोग, वैज्ञानिक नवाचार तथा साक्ष्य-आधारित नीतिगत हस्तक्षेपों की आवश्यकता पर बल दिया।

National Workshop by ICAR-CIFRI, Barrackpore Calls for Urgent National Action Against Invasive Exotic Fishes Threatening India’s Freshwater Ecosystems

डॉ. प्रदीप डे, निदेशक एवं कार्यशाला के संयोजक, भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, ने भारत के मीठे जल पारितंत्रों पर आक्रामक विदेशी मछलियों से बढ़ते खतरे का मुकाबला करने के लिए त्वरित राष्ट्रीय कार्रवाई का आह्वान किया। उन्होंने निगरानी, पारिस्थितिक जोखिम मूल्यांकन, साक्ष्य-आधारित नीतियों, संस्थागत समन्वय तथा प्रभावी प्रबंधन रणनीतियों को समाहित करने वाले एक समन्वित राष्ट्रीय ढाँचे की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने जैव विविधता की रक्षा, सतत अंतर्देशीय मत्स्य पालन को सुदृढ़ करने तथा विकसित भारत @2047 और सशक्त ब्लू इकोनॉमी के दृष्टिकोण के अनुरूप आजीविका सुरक्षा बढ़ाने में विज्ञान-आधारित एवं समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोणों की भूमिका को रेखांकित किया।

इस कार्यशाला में देशभर के भाकृअनुप संस्थानों, विश्वविद्यालयों तथा संबद्ध संगठनों से अग्रणी वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं एवं पर्यावरण विशेषज्ञों ने भाग लिया। तकनीकी विचार-विमर्श में आक्रामक मछलियों के प्रसार एवं प्रवेश मार्ग, पारिस्थितिक एवं जैव विविधता पर प्रभाव, जलवायु परिवर्तन के साथ उनकी अंतःक्रियाएँ, खाद्य शृंखला में परिवर्तन, पारितंत्र क्षरण, आर्थिक प्रभाव तथा रोकथाम एवं प्रबंधन संबंधी नीतिगत प्राथमिकताओं को शामिल किया गया।

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विशेषज्ञों ने जलीय कृषि जैव सुरक्षा, क्वारंटीन प्रोटोकॉल, जोखिम मूल्यांकन तथा जिम्मेदार जलीय कृषि पद्धतियों पर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विदेशी प्रजातियों के प्राकृतिक पारितंत्रों में आकस्मिक प्रवेश और पलायन को रोकने के लिए अधिक सशक्त नियामक सुरक्षा उपाय तथा निवारक कदम आवश्यक हैं।

आक्रामक प्रजातियों के प्रबंधन की बहुविषयक प्रकृति को रेखांकित करते हुए भाकृअनुप-सीआईएफआरआई के विभिन्न प्रभागाध्यक्षों ने महत्वपूर्ण अनुसंधान एवं नीतिगत प्राथमिकताओं को प्रस्तुत किया। वक्ताओं ने दीर्घकालिक पारिस्थितिक निगरानी तथा आक्रामक मछलियों के वितरण पर राष्ट्रीय डेटाबेस विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने खाद्य शृंखला की गतिशीलता और पारितंत्र स्तर के प्रभावों को समझने की आवश्यकता पर भी जोर दिया तथा शीघ्र पहचान के लिए आणविक निदान और ई-डीएनए आधारित निगरानी की संभावनाओं को रेखांकित किया। साथ ही मत्स्य आधारित समुदायों पर सामाजिक-आर्थिक प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया तथा जैव सुरक्षा ढाँचे, नीतिगत समर्थन और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

इस प्रकार आक्रामक प्रजातियों की निगरानी एवं सूचीकरण से संबंधित राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्यों के संदर्भ में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण तथा जैव विविधता अभिसमय के उद्देश्यों के अनुरूप विचार-विमर्श आधारित रह।

कार्यशाला की एक प्रमुख उपलब्धि भारत में आक्रामक विदेशी मछलियों के आकलन, निगरानी एवं प्रबंधन के लिए एक रणनीतिक राष्ट्रीय रोडमैप का निर्माण रही। प्रमुख सिफारिशों में देशव्यापी निगरानी प्रणालियों की स्थापना, संवेदनशील पारितंत्रों के पूर्वानुमान मॉडल विकसित करना, मानकीकृत पारिस्थितिक एवं सामाजिक-आर्थिक मूल्यांकन प्रोटोकॉल तैयार करना, एक केंद्रीकृत राष्ट्रीय डेटाबेस का निर्माण, क्वारंटीन एवं जैव सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करना तथा हितधारकों के लिए व्यापक जागरूकता एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों का विस्तार शामिल था।

कार्यशाला का समापन भारत के मीठे जल पारितंत्रों की सुरक्षा तथा मत्स्य आधारित आजीविकाओं की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए समेकित वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों तथा सहयोगात्मक नीतिगत कार्रवाई के सशक्त आह्वान के साथ हुआ।

(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)

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