भाकृअनुप-राष्ट्रीय समेकित कीट प्रबंधन अनुसंधान संस्थान (एनआरआईआईपीएम), नई दिल्ली, ने अनुसूचित जाति उप-योजना के अंतर्गत कृषि विज्ञान केन्द्र-II, सीतापुर के सहयोग से गोद लिए गए ग्राम अमरापुर (परसेंडी ब्लॉक) एवं कमुवा (बिसवां ब्लॉक) में अनुसूचित जाति किसानों के लिए तकनीकी एवं वैज्ञानिक सशक्तिकरण कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य आईसीटी-सक्षम स्मार्ट ग्राम, बेहतर भविष्य के विकास तथा आईसीटी आधारित कीट निगरानी एवं परामर्श सेवाओं के माध्यम से समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) पद्धतियों का कार्यान्वयन करना था। इस पहल का मुख्य उद्देश्य आईसीटी आधारित आईपीएम दृष्टिकोण को अपनाकर अनुसूचित जाति किसानों की आय और कृषि की स्थिरता में सुधार लाना है।
निर्णय-निर्माण प्रक्रिया को डेटा आधारित होना चाहिए, जिसमें मोबाइल ऐप, जीआईएस मैपिंग, ड्रोन और पूर्वानुमान मॉडल जैसे आईसीटी उपकरणों का उपयोग कर हस्तक्षेपों को सटीकता के साथ निर्देशित किया जाए। राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली (एनपीएसएस) पारंपरिक कीट प्रबंधन विधियों के लिए एक आधुनिक, प्रौद्योगिकी-संचालित विकल्प प्रदान करती है।
एक नई पहल के रूप में, डॉ. आर. थंगावेल्लू, निदेशक, भाकृअनुप-एनआरआईआईपीएम द्वारा गोद लिए गए गांवों में दो आईसीटी-सक्षम कियोस्क का उद्घाटन किया गया, ताकि सतत कीट प्रबंधन के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकियों को अपनाने पर बल दिया जा सके। ये कियोस्क मल्टीमीडिया प्रशिक्षण सामग्री, विशेषज्ञ परामर्श तथा मोबाइल आधारित अलर्ट के प्रसार को भी सुगम बनाते हैं, जिससे किसानों की जागरूकता और निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि होती है।

गांवों में स्थापित आईसीटी-सक्षम कियोस्क, ग्राम स्तरीय सूचना एवं परामर्श केन्द्र के रूप में कार्य करते हुए समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) के कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान कर सकते हैं। ये किसानों को समय पर कीट एवं रोग निगरानी संबंधी अद्यतन जानकारी, मौसम आधारित परामर्श तथा फसल-विशिष्ट आईपीएम सिफारिशें उपलब्ध करा सकते हैं।
किसान इन कियोस्क के माध्यम से कीटों की पहचान, आर्थिक क्षति सीमा स्तर (ईटीएल), जैविक नियंत्रण एजेंटों, सांस्कृतिक प्रथाओं तथा आवश्यकता आधारित कीटनाशक उपयोग संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, जिससे अंधाधुंध कीटनाशक उपयोग में कमी आती है। इसके अतिरिक्त, ये किसानों, केवीके वैज्ञानिकों तथा भाकृअनुप-एनआरआईआईपीएम विशेषज्ञों के बीच त्वरित संचार को सक्षम बनाते हैं, जिससे कीट प्रकोपों की शीघ्र पहचान और उपयुक्त आईपीएम हस्तक्षेपों को समय पर अपनाने में सहायता मिलती है। परिणामस्वरूप फसल उत्पादकता में वृद्धि, उत्पादन लागत में कमी तथा पर्यावरणीय रूप से सतत कृषि को बढ़ावा मिलता है।
स्थानीय आवश्यकताओं और कृषि परिस्थितियों के आधार पर किसानों को आधुनिक कृषि मशीनरी एवं उपकरण जैसे सोलर ड्रायर, बहु-फसली थ्रेशर, रीपर बाइंडर, कृषि कियोस्क तथा स्प्रेयर वितरित किए गए। कार्यक्रम के दौरान एनपीएसएस ऐप एवं वेब पोर्टल का प्रदर्शन किया गया तथा प्रतिभागियों को इस प्लेटफॉर्म की विभिन्न सुविधाओं और मोबाइल फोन तथा कार्यक्रम के अंतर्गत स्थापित कियोस्क के माध्यम से इसकी उपलब्धता के बारे में जानकारी दी गई।
किसानों को एनपीएसएस मोबाइल एप्लिकेशन स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिसके माध्यम से वे प्रभावित फसलों की तस्वीरें अपलोड कर तत्काल वैज्ञानिक सिफारिशें प्राप्त कर सकते हैं। इससे गलत निदान और रसायनों के अत्यधिक उपयोग के जोखिम में कमी आती है।

कार्यक्रम में किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) की सामूहिक विपणन, संसाधन प्रबंधन तथा किसानों के बीच कृषि प्रौद्योगिकियों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित किया गया। इस बात पर बल दिया गया कि कृषि विज्ञान केंद्र ग्रामीण आजीविकाओं को सुदृढ़ करने तथा कृषि आधारित उद्यमिता के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने के लिए आवश्यकता आधारित कृषि प्रौद्योगिकियों और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को निरंतर बढ़ावा दे रहे हैं।
बड़ी संख्या में किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों तथा ग्रामीण युवाओं ने वैज्ञानिक कृषि प्रौद्योगिकियों में गहरी रुचि व्यक्त की। प्रतिभागी इस बात को लेकर उत्साहित थे कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के कार्यान्वयन से कीट नियंत्रण को एक बिखरी हुई और अक्सर कम प्रभावी प्रक्रिया से बदलकर एक स्मार्ट, त्वरित प्रतिक्रिया देने वाली तथा किसान-केंद्रित व्यवस्था में परिवर्तित किया जा सकता है, जो उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ फसलों और पारिस्थितिक तंत्र दोनों की रक्षा करती है।
(स्रोत: भाकृअनुप-राष्ट्रीय समेकित कीट प्रबंधन अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली)







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