12 फरवरी, 2026, नई दिल्ली
डॉ. एम.एल. जाट, सचिव (डेयर) एवं महानिदेशक (भाकृअनुप) ने भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली, के 64वें दीक्षांत समारोह में 56वें लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल लेक्चर के मौके पर भारत के कृषि खाद्य व्यवस्था को बदलने पर एक ज़बरदस्त संबोधन दिया। लेक्चर में पारंपरिक उत्पादन आधारित प्रतिमान से समावेशी, लचीला कृषि खाद्य व्यवस्था, जो सभी हितधारकों के लिए स्वास्थ्य, पोषण, टिकाऊपन और हिस्सेदारी देने में सक्षम हों जिसकी जरूरत पर जोर दिया गया । डॉ. जाट ने जोर दिया कि भारत की खेती को पोषण सुरक्षा, टिकाऊ पर्यावरण और सामाजिक-आर्थिक समावेशन पक्का करने के लिए पैदावार से आगे बढ़ना होगा, जो 2047 तक देश के विकसित भारत के विज़न के साथ मेल खाता हो। उन्होंने ऐसे वैज्ञानिक तथा नीतिगत ढ़ांचा की मांग की जो मिट्टी, पौधे, जानवर, इंसान और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को एक ऐसी रणनीति में समावेश करे जो जलवाय-अनुकूल एवं संसाधन उपयोग दक्षता को सपोर्ट करे। उनके मैसेज का सेंटर था वन हेल्थ और व्यवस्था आधारित सोच का महत्व, जिसमें पारिस्थितिकी तंत्र, खाद्य मूल्य श्रृंखला और समुदाय की भलाई की एक-दूसरे पर निर्भरता को पहचाना गया।
एसईऐएचएटी (कृषि परिवर्तन के ज़रिए स्वास्थ्य के लिए विज्ञान वैज्ञानिक उत्कृष्टता) खेती, खाने और पोषण, और स्वास्थ्य के मिले-जुले असर पर ज़ोर देता है, और इस बात पर ज़ोर देता है कि सेहतमंद मिट्टी और बायो फोर्टिफाइड, अलग-अलग तरह की फसलें बीमारी की रोकथाम, पोषण सुरक्षा तथा पूरी भलाई के लिए ज़रूरी हैं। यह पहल भाकृअनुप-आसीएमआर के बीच मजबूत सहयोग को दिखाती है, जो एक व्यवस्था-आधारित तरीके को मजबूत करती है, जहां कृषि अनुसंधान सीधे तौर पर टिकाऊ और पोषण पोषण उन्मुख कृषि एवं खाद्य तंत्र के ज़रिए बेहतर जन स्वास्थ्य नतीजों में योगदान देती है।

डॉ. जाट ने अनुसंधानकर्ता, विस्तार प्रोफेशनल्स और नीति निर्माता से ऐसे सर्वांगीण रूप से अपनाने का आग्रह किया जो खाद्य प्रसंस्करण, बाजार संपर्कों, डिजिटल तकनीकी तथा जलवायु-समावेशी नवाचार को मजबूत करें, जिनका मकसद छोटे किसानों, महिलाओं तथा युवाओं की रोजी-रोटी को बेहतर बनाना हो। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि कृषि खाद्य प्रणाली को कुपोषण, सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी, जलवायु परिवर्तन और साधन तक असमान पहुंच जैसी उभरती चुनौतियों का सामना करना होगा, और इस बदलाव को पाने के लिए सटीक खेती, बायोफोर्टिफिकेशन, कृत्रिम मेधा (AI)-प्रेरित समाधान तथा टिकाऊ खेती के तरीकों में हुई तरक्की का फ़ायदा उठाना होगा। डॉ. जाट ने विभिन्न हितधारक आधारित साझेदारी, मांग-प्रेरित अनुसंधान तथा किसान-केन्द्रित तथा प्रभावी ढ़ांचा के ज़रिए इस बदलाव को आगे बढ़ाने के लिए भाकृअनुप के समर्पण को दोहराया, जो साइंस को जमीनी हकीकत से जोड़ता है। उनके लेक्चर ने अगली पीढ़ी के कृषि नेतृत्व को मजबूत बनाने में शिक्षा और क्षमता निर्माण की भूमिका को भी पक्का किया।
प्रोग्राम का उद्घाटन श्री सुनील शास्त्री जी ने दीप प्रज्वलन के साथ किया। सत्र के चेयरपर्सन, प्रो. रमेश चंद, सदस्य, नीति आयोग, ने भी इस बात पर जोर दिया कि भारत के कृषि खाद्य श्रृंखला को जलवायु चुनौतियों एवं आर्थिक हकीकतों, दोनों से निपटने के लिए फिर से तैयार किया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि खेती का ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में काफी हिस्सेदारी देती है, लेकिन इसमें कार्बन संचय एवं सतत संसाधन प्रबंधन की भी क्षमता है, जिसका अभी तक इस्तेमाल नहीं हुआ है। उन्होंने पारंपरिक प्राइस मैट्रिक्स से आगे बढ़कर प्राकृतिक संसाधन तथा जलवायु पर पड़ने वाले असर को शामिल करने के लिए आर्थिक एनालिसिस की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। प्रो. चंद ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भविष्य के लिए जलवायु-अनुकूल, पोषण सुरक्षित तथा आर्थिक रूप से व्यवहार्य खाद्य व्यवस्था बनाने के लिए सरकार, निजी क्षेत्र, सामुदायिक संगठन और फाइनेंशियल संस्थान को जोड़ने वाली एक बहु-हितधारक निवेश रणनीति जरूरी है।
डॉ. चेरुकमल्ली श्रीनिवास राव, निदेशक, भाकृअनुप-आईएआरआई, ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत, जो कभी मुख्य रूप से भूख के खिलाफ लड़ाई में लगा हुआ था, अब अनहेल्दी डाइट की वजह से गिरती पब्लिक हेल्थ की एक ज़्यादा मुश्किल चुनौती का सामना कर रहा है। देश में बीमारियों का 56 परसेंट से ज़्यादा बोझ डाइट से जुड़ा है।

खेती को इंसानी सेहत में उतना ही जरूरी रोल निभाना चाहिए जितना मेडिकल साइंस का, क्योंकि आजकल के एग्री-फूड सिस्टम, जो ज्यादातर कैलोरी और चीजों पर आधारित हैं, उन्होंने पोषण, विविधता तथा पर्यावरणीय टिकाऊपन को नजरअंदाज कर दिया है। इस बात पर ज़ोर देते हुए कि हेल्दी खाना हेल्दी मिट्टी से ही बनता है, उन्होंने मिट्टी के खराब होने, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी और चावल-गेहूं की मोनोकल्चर जैसी आसान फसल उगाने के सिस्टम को खराब आहार गुणवत्ता, जैव विविधता के नुकसान और जलवायु की कमजोरी के लिए जिम्मेदार बताया। मिट्टी के माइक्रोब्स से लेकर इंसानी गट माइक्रोबायोम तक के सिलसिले पर ज़ोर देते हुए, डॉ. राव ने इस बात पर ज़ोर दिया कि समेकित, व्यवस्था आधारित समाधान तथा टिकाऊ खाद्य श्रृंखला की ओर बदलाव की ज़रूरत है जो एक साथ उत्पादन, पोषण, पर्यावरण एवं रोज़ी-रोटी पर ध्यान दें ताकि पोषण सुरक्षा, जलवायु प्रतिरोधी और सभी के लिए स्वस्थ जीवन सुनिश्त हो सके।
इस इवेंट को वैज्ञानिकगण, स्टूडेंट्स, नीति निर्माता तथा किसान समुदाय के प्रतिनिधि ने खूब पसंद किया, जिससे भारत के लिए एक मजबूत, पोषणयुक्त और बराबर कृषि खाद्य भविष्य की मिलकर की जा रही कोशिश को मजबूती मिली।
(स्रोत: भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली)







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