भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर ने खेत बचाओ अभियान के तहत गुमला में किसानों को सतत कृषि के प्रति किया जागरूक

भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर ने खेत बचाओ अभियान के तहत गुमला में किसानों को सतत कृषि के प्रति किया जागरूक

26 जून, 2026, गुमला, झारखंड

सतत कृषि और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करते हुए, भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-सीआईएफआरआई), बैरकपुर, ने आज झारखंड के गुमला जिले के घाघरा प्रखंड स्थित मसारिया जलाशय परिसर में खेत बचाओ अभियान के अंतर्गत किसानों के लिए एक जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया। भाकृअनुप-सीआईएफआरआई के निदेशक डॉ. प्रदीप डे के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य जलवायु अनुकूल एवं पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना था।

कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधियों और तकनीकी विशेषज्ञों ने भाग लिया तथा प्रतिभागियों के साथ संवाद किया। तकनीकी विचार-विमर्श में खेत बचाओ अभियान के प्रमुख उद्देश्यों पर विशेष ध्यान दिया गया, जिसमें मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग, प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के महत्व पर बल दिया गया।

सभा को संबोधित करते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि मृदा और जल संसाधनों का सतत प्रबंधन कृषि उत्पादकता बढ़ाने, पर्यावरणीय क्षरण को कम करने तथा ग्रामीण समुदायों की दीर्घकालिक आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसानों को पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जो जलवायु संबंधी अनिश्चितताओं के प्रति उनकी अनुकूलन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र की भी रक्षा कर सकती हैं।

ICAR-CIFRI, Barrackpore Sensitizes Farmers on Sustainable Agriculture under Khet Bachao Abhiyaan in Gumla

कार्यक्रम पर अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. डे ने उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से होने वाले पारिस्थितिक दुष्प्रभावों, जैसे मृदा क्षरण, पोषक तत्वों की हानि तथा जलीय पारिस्थितिकी के बिगड़ते स्वास्थ्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने सतत कृषि और मत्स्य पालन के लिए मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन, संतुलित उर्वरीकरण, जैव उर्वरकों तथा जैविक संशोधनों के महत्व पर जोर दिया। डॉ. डे ने आगे कहा कि वैज्ञानिक वर्मी कम्पोस्टिंग तथा सतत अंतर्देशीय मत्स्य प्रबंधन जैसे प्रकृति आधारित हस्तक्षेप संसाधन उपयोग दक्षता बढ़ा सकते हैं, निवेश लागत को कम कर सकते हैं तथा विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने में योगदान दे सकते हैं।

कार्यक्रम का समापन एक संवादात्मक सत्र के साथ हुआ, जिसमें किसानों ने अपने अनुभव साझा किए, खेत-स्तरीय समस्याओं को उठाया तथा वैज्ञानिकों से सतत कृषि प्रौद्योगिकियों पर व्यावहारिक मार्गदर्शन प्राप्त किया। इस जागरूकता पहल ने किसानों में संसाधन संरक्षण के प्रति समझ को सुदृढ़ किया तथा क्षेत्र में सतत एवं जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के प्रति आईसीएआर-सीआईएफआरआई की प्रतिबद्धता को पुनः स्थापित किया।

कार्यक्रम में कुल 57 किसानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया, जिनमें 47 पुरुष और 10 महिलाएं शामिल थीं। यह सतत कृषि विकास के प्रति कृषक समुदायों की बढ़ती रुचि को दर्शाता है।

(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर, कोलकाता)

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