भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर के वैज्ञानिक मत्स्य कार्यक्रम से ओडिशा के रिशिया जलाशय के जनजातीय मछुआरों को मिली नई उम्मीद

भाकृअनुप-सीआईएफआरआई, बैरकपुर के वैज्ञानिक मत्स्य कार्यक्रम से ओडिशा के रिशिया जलाशय के जनजातीय मछुआरों को मिली नई उम्मीद

ओडिशा के बालासोर जिले स्थित रिशिया जलाशय के आसपास रहने वाले सीमांत एवं जनजातीय मछुआरों के लिए पीढ़ियों से मत्स्य पालन अनिश्चित उत्पादन और अस्थिर आय का साधन रहा है। आज वहाँ एक सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे रहा है, जो केवल मछली उत्पादन में वृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि मजबूत पारिवारिक अर्थव्यवस्था, नई परिसंपत्तियों और बेहतर भविष्य की उम्मीदों में भी परिलक्षित हो रहा है।

भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान–वर्ल्डफिश सहयोगी कार्यक्रम (विंडो-3) के अंतर्गत बालासोर जिले के रिशिया जलाशय में एक हितधारक बैठक एवं जागरूकता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य पिछले दो वर्षों में लागू की गई वैज्ञानिक मत्स्य हस्तक्षेपों के प्रभाव का मूल्यांकन करना था।

Scientific Fisheries Programme by ICAR-CIRFI, Barrackpore Brings New Hope to Tribal Fishers of Odisha’s Rishia Reservoir

वैज्ञानिकों और परियोजना कर्मियों के साथ बातचीत के दौरान एक जनजातीय मछुआरे श्री गणेश्वर नायक ने अपने जीवन में आए बदलाव की भावनात्मक कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि बेहतर मत्स्य उत्पादन और कार्यक्रम के तहत प्राप्त बेहतर बाजार मूल्य के कारण पहली बार उनके परिवार की आय अभूतपूर्व स्तर तक पहुँची है। बढ़ी हुई आय से उन्होंने हाल ही में अपने परिवार के लिए एक मोटरसाइकिल खरीदी, जो पहले उनके लिए केवल एक सपना थी। उनके लिए यह मोटरसाइकिल केवल एक वाहन नहीं, बल्कि सम्मान, गतिशीलता और बेहतर भविष्य का प्रतीक है।

आईसीएआर-सीआईएफआरआई और वर्ल्डफिश की टीमों द्वारा किए गए क्षेत्रीय मूल्यांकन से पता चला कि ऐसी कहानियाँ अब अपवाद नहीं रह गई हैं। कार्यक्रम में शामिल मछुआरों की पारिवारिक आय में हस्तक्षेप-पूर्व अवधि की तुलना में वर्तमान वर्ष में 43 से 59 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है।

परियोजना के उत्साहजनक परिणामों की सराहना करते हुए डॉ. प्रदीप डे, निदेशक, आईसीएआर-सीआईएफआरआई ने आर्थिक रूप से कमजोर मछुआरा समुदायों की आजीविका सुरक्षा बढ़ाने के लिए परियोजना दल के समर्पित प्रयासों की प्रशंसा की। उन्होंने परियोजना की अवधारणा से लेकर सफल क्रियान्वयन तक प्राप्त सतत मार्गदर्शन और क्षेत्रीय सहयोग को भी महत्वपूर्ण बताया।

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डॉ. डे ने कहा कि विज्ञान-आधारित और समुदाय-केन्द्रित मत्स्य हस्तक्षेप दूरदराज़ क्षेत्रों में सतत अंतर्देशीय मत्स्य विकास, आजीविका संवर्धन और जनजातीय सशक्तिकरण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि यह पहल “विकसित भारत @2047” की परिकल्पना के अनुरूप समावेशी विकास, ग्रामीण समृद्धि और संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा देती है तथा अंतर्देशीय मत्स्य पालन आधारित आजीविका अवसरों के माध्यम से ब्लू इकोनॉमी को सशक्त बनाती है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि देशभर के कमजोर मछुआरा समुदायों की आजीविका सुरक्षा को मजबूत करने के लिए साक्ष्य-आधारित नीतियों, संस्थागत समन्वय तथा समुदाय-आधारित मत्स्य मॉडल के विस्तार की आवश्यकता है।

कार्यक्रम की सफलता कई वैज्ञानिक हस्तक्षेपों पर आधारित है, जिनमें वैज्ञानिक मत्स्य बीज संचयन (फिश स्टॉकिंग), समुदाय-आधारित मत्स्य प्रबंधन, जागरूकता निर्माण तथा सतत मत्स्य पालन पद्धतियों को बढ़ावा देना शामिल है। उत्साहजनक रूप से, जलाशय से जुड़े समुदाय अब ईको-टूरिज्म और जलाशय-आधारित पर्यटन गतिविधियों की संभावनाओं का भी अन्वेषण कर रहे हैं, जिससे स्थानीय परिवारों के लिए अतिरिक्त मौसमी आय के स्रोत विकसित हो रहे हैं।

(स्रोत: भाकृअनुप–केन्द्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर)

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