भाकृअनुप-सीआईएआरआई, श्री विजयपुरम द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान’ के अंतर्गत संतुलित उर्वरक उपयोग पर आदान विक्रेताओं एवं हितधारकों की परामर्श बैठक का आयोजन

भाकृअनुप-सीआईएआरआई, श्री विजयपुरम द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान’ के अंतर्गत संतुलित उर्वरक उपयोग पर आदान विक्रेताओं एवं हितधारकों की परामर्श बैठक का आयोजन

3 जून, 2026, श्री विजयपुरम, अंडमान एवं निकोबार

राष्ट्रव्यापी पहल "खेत बचाओ अभियान" के अंतर्गत भाकृअनुप-केन्द्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान (सीआईएआरआई), श्री विजयपुरम ने आज संतुलित उर्वरक उपयोग विषय पर आदान विक्रेताओं एवं हितधारकों के लिए एक परामर्श बैठक आयोजित की। इस कार्यक्रम में आदान विक्रेताओं, वैज्ञानिकों तथा कृषि विभाग, सीआईपीएमसी एवं कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके) के अधिकारियों ने भाग लिया और अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में टिकाऊ कृषि पद्धतियों तथा मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन पर चर्चा की।

डॉ. देबब्रत बसंतिया, निदेशक, कृषि, अंडमान एवं निकोबार प्रशासन ने “खेत बचाओ अभियान” के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला और मृदा स्वास्थ्य बनाए रखने तथा दीर्घकालिक कृषि स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए उर्वरकों के संतुलित उपयोग के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि एक माह तक चलने वाले इस अभियान का उद्देश्य भाकृअनुप-सीआईएआरआई, केवीके, एटीएमए तथा कृषि विभाग के संयुक्त प्रयासों के माध्यम से गांव स्तर पर सीधे व्यावहारिक जानकारी एवं तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराकर किसानों में जागरूकता बढ़ाना तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करना है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह अभियान कृषि समुदाय के बीच महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करेगा।

ICAR-CIARI, Sri Vijaya Puram Organises Input Dealers and Stakeholders Consultation Meeting on Balanced Use of Fertilizers under ‘Khet Bachao Abhiyan’

आदान विक्रेताओं, हितधारकों, वैज्ञानिकों तथा कृषि विभाग के अधिकारियों के बीच एक खुली चर्चा आयोजित की गई। विचार-विमर्श के दौरान कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए। प्रतिभागियों ने मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के लिए उर्वरकों एवं जैव-कीटनाशकों के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल दिया तथा जैव-नियंत्रण एजेंटों को अधिक अपनाने की वकालत की। यह सुझाव दिया गया कि कृषि विभाग आईसीएआर-सीआईएआरआई के तकनीकी मार्गदर्शन में ट्राइकोडर्मा आधारित जैव-नियंत्रण उत्पादों का उत्पादन कर सकता है। बैठक में ब्लॉक स्तर पर बीज संग्रह केन्द्र स्थापित करने का भी प्रस्ताव रखा गया, जहां किसानों द्वारा उत्पादित गुणवत्तायुक्त बीजों की खरीद कर उन्हें किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के माध्यम से वितरित किया जा सके, जबकि आईसीएआर-सीआईएआरआई ब्रीडर एवं मूल बीज सामग्री उपलब्ध कराएगा।

वैज्ञानिकों ने बताया कि भाकृअनुप-सीआईएआरआई ने गुणवत्तायुक्त सब्जी किस्में विकसित की हैं, जिनमें बैंगन-1 और बैंगन-2 शामिल हैं, जो म्लानि (विल्ट) रोग प्रतिरोधी, अधिक उपज देने वाली तथा द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए उपयुक्त हैं। मृदा उर्वरता में सुधार तथा मृदा में नाइट्रोजन स्तर बढ़ाने के लिए दलहन आधारित फसल चक्र के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। संस्थान के पास द्वीपीय परिस्थितियों के लिए उपयुक्त गुणवत्तायुक्त धान के ब्रीडर बीज तथा बायो-कंसोर्टिया स्ट्रेन भी उपलब्ध हैं, जिन्हें कृषि विभाग के माध्यम से बढ़ाकर किसानों में वितरित किया जा सकता है।

कीट प्रबंधन के लिए रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग को कम करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। नारियल में रूगोज स्पाइरलिंग व्हाइटफ्लाई (आरएसडब्ल्यू) के प्रभावी प्रबंधन के लिए जैव-फफूंदनाशी इसारिया फ्यूमोसोरोसिया (Isaria fumosorosea) के उपयोग की सिफारिश की गई। आरएसडब्ल्यू के विरुद्ध पर्यावरण-अनुकूल एवं प्रभावी जैविक नियंत्रण उपाय के रूप में एन्कार्सिया ग्वाडेलूपी (Encarsia guadeloupae) परजीवी की रिहाई का भी सुझाव दिया गया। पपीता मिलीबग के प्रबंधन के लिए एसेरोफेगस पपायी (Acerophagus papayae) परजीवी के उपयोग की सिफारिश की गई, क्योंकि यह बागवानी पारिस्थितिकी तंत्र में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ है तथा टिकाऊ कीट प्रबंधन में योगदान देता है।

ICAR-CIARI, Sri Vijaya Puram Organises Input Dealers and Stakeholders Consultation Meeting on Balanced Use of Fertilizers under ‘Khet Bachao Abhiyan’

अपने समापन संबोधन में डॉ. जय सुंदर, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएआरआई ने कृषि विभाग से प्राकृतिक खेती के अंतर्गत आने वाले कुल क्षेत्र का स्पष्ट सीमांकन एवं दस्तावेजीकरण करने तथा किसानों के लिए बाजार अवसरों को बढ़ाने हेतु प्रमाणन प्रक्रिया प्रारंभ करने का आग्रह किया। उन्होंने अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह की बीज आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्थानीय स्तर पर गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन में एफपीओ की संभावित भूमिका पर भी बल दिया। डॉ. सुंदर ने गांवों में उपलब्ध गोबर, गौमूत्र, बकरी खाद तथा पोल्ट्री खाद का उपयोग करते हुए सामुदायिक स्तर पर वर्मी कम्पोस्ट इकाइयों की स्थापना की भी वकालत की। उन्होंने जलवायु-अनुकूल कृषि योजना को समर्थन देने के लिए द्वीपों में एल नीनो से प्रभावित क्षेत्रों के संवेदनशीलता मानचित्र तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने खरपतवार प्रबंधन, नमी संरक्षण, मल्चिंग तथा मृदा अपरदन नियंत्रण के लिए सुपारी की भूसी से बनी चटाई संरचनाओं को बढ़ावा देने की भी सिफारिश की। सूखे की परिस्थितियों में जल के कुशल साझाकरण हेतु सामुदायिक जल संचयन संरचनाओं की स्थापना को भी एक महत्वपूर्ण जलवायु अनुकूलन उपाय के रूप में सुझाया गया।

परामर्श बैठक का समापन सभी हितधारकों द्वारा अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में जारी “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत टिकाऊ कृषि, मृदा स्वास्थ्य पुनर्स्थापन तथा जलवायु-अनुकूल कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देने के लिए मिलकर कार्य करने की दृढ़ प्रतिबद्धता के साथ हुआ।

(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान, श्री विजयपुरम, अंडमान एवं निकोबार)

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