तटीय क्षेत्रों में सतत जलीय कृषि एवं प्रजातीय विविधीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए, आईसीएआर-केंद्रीय खारे पानी की जलीय कृषि संस्थान (भाकृअनुप-सीबा), चेन्नई, ने पहली बार संस्थान में उत्पादित हैचरी बीज तथा भाकृअनुप-सीबा द्वारा वैज्ञानिक रूप से विकसित पेलेटयुक्त फॉर्म्युलेटेड फीड का उपयोग करते हुए ब्लू स्विमर केकड़ा (पोर्टुनस रेटिकुलेटस) पालन तकनीक का सफल प्रदर्शन किया।
यह प्रदर्शन ब्लू स्विमर केकड़ा (बीएससी) जलीय कृषि के लिए संपूर्ण एंड-टू-एंड उत्पादन पैकेज के सफल प्रमाणीकरण का प्रतीक है, जिसमें हैचरी बीज उत्पादन, विशेषीकृत फीड, नर्सरी पालन तथा ग्रो-आउट पालन पद्धतियां शामिल हैं। यह तकनीक उन किसानों के लिए एक आशाजनक नया अवसर प्रदान करती है, जो वर्तमान झींगा पालन प्रणालियों के पूरक अथवा लाभदायक विकल्प की तलाश कर रहे हैं।

प्रदर्शन परीक्षण के दौरान ब्लू स्विमर केकड़ा बीज का संचयन प्रति वर्ग मीटर एक केकड़ा की घनत्व पर किया गया तथा उन्हें भाकृअनुप-सीबा द्वारा विकसित पोषण संतुलित फॉर्म्युलेटेड फीड खिलाया गया। 105 दिनों की पालन अवधि के बाद प्रति हैक्टर 1,100 किलोग्राम उत्पादकता प्राप्त हुई तथा विपणन योग्य केकड़ों का औसत शारीरिक भार 150 ग्राम रहा। उत्पादित केकड़ों को बाजार में 500 रुपये प्रति किलोग्राम का आकर्षक मूल्य प्राप्त हुआ, जिसने इस तकनीक की मजबूत व्यावसायिक संभावनाओं को रेखांकित किया।
इस पालन प्रणाली के प्रदर्शन को प्रदर्शित करने के लिए 22 जून 2026 को भाकृअनुप-सीबा के मुट्टुकाडु प्रायोगिक केन्द्र में एक कटाई समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर अनुसूचित जाति उप-योजना (एससीएसपी) कार्यक्रम के अंतर्गत इस प्रदर्शन में सहभागी एम/एस सक्सेस स्वयं सहायता समूह, पुधुनेम्मेलिकुप्पम, चेंगलपट्टू जिला को 1,22,500 रुपये की राजस्व राशि प्रदान की गई।

सभा को संबोधित करते हुए डॉ. कुलदीप कुमार लाल, निदेशक, भाकृअनुप-सीबा, ने घोषणा की कि संस्थान ने ब्लू स्विमर केकड़ा जलीय कृषि के लिए एक व्यापक तकनीकी पैकेज का सफलतापूर्वक मानकीकरण कर लिया है। इस पैकेज में उन्नत हैचरी बीज उत्पादन प्रोटोकॉल, बीएसक्रैबप्लस (BSCrabPlus) नामक विशेष फॉर्म्युलेटेड फीड तथा अनुकूलित नर्सरी एवं ग्रो-आउट पालन पद्धतियां शामिल हैं।
उन्होंने कहा, “ब्लू स्विमर केकड़ा का पालन अपेक्षाकृत कम उत्पादन अवधि में सफलतापूर्वक किया जा सकता है, जो झींगा पालन के समान है। खारे पानी में पाई जाने वाली कई अन्य केकड़ा प्रजातियों की तुलना में इसमें परस्पर भक्षण (कैनिबलिज्म) की प्रवृत्ति कम होती है तथा घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी मजबूत मांग है। इसलिए यह तकनीक जलीय कृषि विविधीकरण के लिए अत्यंत व्यवहार्य एवं सतत विकल्प प्रस्तुत करती है।”

इस कटाई समारोह में डॉ. एस. कंदन, निदेशक, राजीव गांधी जलीय कृषि केंद्र (आरजीसीए), समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एमपीईडीए) भी उपस्थित रहे। इस उपलब्धि की सराहना करते हुए उन्होंने तटीय क्षेत्रों में इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर अपनाने के लिए इसके विस्तार के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा, “भाकृअनुप-सीबा जैसे अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकों को एमपीईडीए के अंतर्गत आरजीसीए के माध्यम से प्रभावी रूप से किसानों तक पहुंचाया जा सकता है। ब्लू स्विमर केकड़ा पालन का विस्तार सुनिश्चित करेगा कि वैज्ञानिक नवाचार तटीय समुदायों के लिए प्रत्यक्ष लाभ में परिवर्तित हों, साथ ही भारत के निर्यात पोर्टफोलियो में उच्च मूल्य वाले समुद्री खाद्य उत्पाद को भी शामिल किया जा सके।”
कार्यक्रम का समापन वैज्ञानिकों, किसानों एवं अन्य हितधारकों के बीच सक्रिय संवाद के साथ हुआ, जिन्होंने सफल कटाई प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। इस प्रदर्शन से ब्लू स्विमर केकड़ा पालन को व्यापक स्तर पर अपनाने का मार्ग प्रशस्त होने तथा सतत जलीय कृषि विविधीकरण के माध्यम से भारत की ब्लू इकोनॉमी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिलने की अपेक्षा है।
(स्रोत: भाकृअनुप-केन्द्रीय खारे पानी की जलीय कृषि संस्थान, चेन्नई)







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